रायपुर। सुशासन और जीरो टॉलरेंस की थीम पर कार्य कर रही विष्णुदेव सरकार के सुसाशन की हवा उन्हीं के अफसर निकालने पर उतारू हैं। मामला जल संसाधन विभाग का है जहां 53 लाख रुपये की सुरक्षा निधि कार्य पूर्ण होने से पूर्व ही ठेकेदार को वापस कर दी गई । बिलासपुर जिले के जल संसाधन के कोटा संभाग के दबेना एनीकट निर्माण में हुए इस घोटाले ने विभाग कार्यप्रणाली पर प्रश्न खड़ा कर दिया है। मजे की बात यह है कि जब इस पर प्रश्न किया जाता है तो जिम्मेदार अधिकारी जवाब देने के बजाय भाग खड़े होते हैं। ऐसे में ये कहना गलत नहीं होगा कि क्या जल संसाधन विभाग मुख्यमंत्री को गुमराह कर रहा है या फिर मोदी की गारंटी पर लालफीताशाही भारी पड़ रही है।

मीडिया का कैमरा देखते ही भाग खड़े हुए ईएनसी

मामले की पड़ताल करने जब राष्ट्रीय जगत विजन के सीनियर रिपोर्टर इमरान, जल संसाधन विभाग के मुख्यालय पहुचे और मामले की जानकारी लेनी चाही तो विभाग प्रमुख श्री नेताम व्यवहार चौकाने वाला था। प्रश्न सुनते ही श्री नेताम वहां से चलते बने और किसी प्रकार का जवाब नहीं दिया साथ ही ये भी कहा की आप के सवालो का जवाब सितम्बर के बाद देंगे उनके इस विचित्र व्यवहार से ऐसा लगा जैसे उन्होंने इस सवाल में किसी खतरे को भांप लिया हो और उत्तर देने की जगह पूरी जिम्मेदारी विभागीय सचिव सु कुमार टोप्पो पर डाल दी। मामले को लेकर राष्ट्रीय जगत विजन की टीम महानदी भवन मंत्रालय में बैठे सचिव महोदय के ऑफिस भी पहुची मगर ईएनसी के विभागीय बैठकों में व्यस्त रहने के कारण वो भी इस गंभीर विषय पर बात करने से बचते रहे । 

 

जाने क्या है पूरा मामला ....... 

नियमनुसार ठेकेदार से ली गई अतिरिक्त सुरक्षा निधि (एपीएस) काम पूर्ण होने के बाद वापस की जाती है इस दौरान विभाग निर्माण की गुणवत्ता से पूरी तरह संतुष्टी भी करता है। कोटा संभाग का दबेना एनीकट की निर्माण की स्वीकृत राशी 5 करोड़ 20 लाख रुपये थी। आरोप है कि जून 2024 में काम पूर्ण न होने के बाद ठेकेदार को 53 लाख रुपये की एपीएस राशि वापस कर दी गई। इस बीच यदि ठेकेदार बीच में ही काम अधूरा छोड़ देता या निर्माण में भारी खामियां मिलतीं तो सरकार के पास क्षतिपूर्ति का कोई रास्ता नहीं बचता। इसकी क्षति सरकारी खजाने को होती ।

कार्रवाई की जगह विवादित अधिकारी को दे दिया प्रमोशन

 विभाग की कार्यप्रणाली भी गजब है जहां गड़बड़ी करने पर सजा नहीं बल्कि प्रमोशन मिलता है छत्तीसगढ़ विधानसभा के मानसून सत्र में माननीय विधायक विद्यावती सिदार ने ये मामला जोर शोर से उठाया था। उन्होंने विधानसभा में ध्यानाकर्षण के माध्यम से पूछा कि दोषियों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई। विधानसभा में विभाग ने जो उत्तर दिया वह सुशासन की साख पट बट्टा लगाने के लिए कम नहीं है। प्रमुख अभियंता ने तत्कालीन कार्यपालन अभियंता आई. ए सिद्धीकी पर कार्रवाई के लिए शासन को प्रस्ताव भेजा था। लेकिन इन सब को दरकिनार करते हुए फरवरी 2026 में उन्हें अधीक्षण अभियंता बना दिया गया। विभाग ने बड़ी सरलता से कह दिया कि पदोन्नति के समय कोई विभागीय जांच लंबित नहीं थी।

खुद ही मान रहे हैं नियम टूटा

इस पूरे मामले में कोटा कार्यपालन अभियंता डी. जायसवाल ने स्वीकार किया है कि ठेकेदार को काम पूरा होने से पहले राशि देना पूरी तरह नियम के खिलाफ है । हालांकि श्री जायसवाल अपने पक्ष में बचाव करते हुए कहा कि अब एनीकट बन गया है और जब तक ठेकेदार एपीएस का पैसा वापस नहीं करेगा उसका अंतिम बिल पास नहीं होगा। लेकिन अब प्रश्न ये भी है की नियम टूटने के दौरान अधिकारी क्या कर रहे थेl 

 

ऐसे ही मामले में जशपुर में 2 पर कार्यवाही मगर 2 को अभयदान 

 

इसी तरह का एक मामला जशपुर जिले की मांड नदी सुसडेगा योजना निर्माण के दौरान आया था। सुसडेगा निर्माण में करीब 2 करोड़ 93 लाख रुपये ठेकेदार को निर्माण पूर्व ही लौटा दिए गए थे। मामला सामने आने के बाद विभागीय निर्देश पर तुरंत तत्कालीन कार्यपालन अभियंता विजय जमनिक पर एफआईआर दर्ज करा दी गई थी । वहीं ऐसे ही एक मामले में कार्यपालन अभियंता पी के मजूमदार की पेंशन रोक दी गई।

वहीं रायगढ़ में कार्यपालन अभियंता सुशील कुमार गुप्ता और दबेना मामले में चर्चित आई ए सिद्दकी को विभाग ने अभय दान दे दिया। अब प्रश्न ये खड़ा हो गया है कि जब ऐसे ही मामले में जशपुर में आपराधिक प्रकरण दर्ज कराया जा सकता है और एक अधिकारी की पेंशन रोकी जा सकती है तो दबेना एनीकट मामले में जिम्मेदार अफसरों को अभयदान क्यों दिया जा रहा है । 

 

कुछ प्रश्न जिनके उत्तर मिलना बाकी है ।

1. समय से पहले भुगतान करने का आदेश आखिर किस बड़े अधिकारी ने दिया था

 2. जिम्मेदार अधिकारियो पर अब तक कोई ठोस विभागीय कार्रवाई क्यों नहीं हुई

 3. जांच की अनुशंसा होने के बावजूद एक दागी अफसर को प्रमोशन कैसे मिल गया

 4.. क्या मुख्यमंत्री के भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन के दावे अफसरशाही के सामने बेबस हैं