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खरगोन: मध्यप्रदेश के खरगोन में सरकारी बागवानी योजना के तहत पॉलीहाउस लगाने के नाम पर कथित वित्तीय अनियमितताओं का मामला सामने आया है। आरोप है कि किसानों को योजना का लाभ दिलाने के भरोसे पर उनके जमीन संबंधी दस्तावेज लिए गए, फिर उनके नाम पर बैंक से करोड़ों रुपये का कर्ज स्वीकृत कराया गया। जांच में कुछ मामलों में पॉलीहाउस का निर्माण किए बिना ही काम पूरा होने के प्रमाण पत्रों के आधार पर भुगतान लेने की बात सामने आई है।
आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) ने इस मामले में चार निजी फर्मों, उनके संचालकों और बैंक के तत्कालीन अधिकारियों सहित 11 लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की है। जांच का दायरा 33 किसानों के नाम पर स्वीकृत ₹7.80 करोड़ से अधिक के पॉलीहाउस ऋणों तक फैला है। EOW अब यह पता लगाने में जुटी है कि लोन की रकम किस तरह जारी हुई और कथित गड़बड़ी में किन-किन लोगों की क्या भूमिका रही ?
33 किसानों के नाम पर 33 लोन, निजी फर्मों तक पहुंची रकम
EOW की जांच के मुताबिक, राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत 33 किसानों के नाम पर कुल ₹7,80,85,000 के 33 ऋण प्रकरण तैयार किए गए। आरोप है कि किसानों को पॉलीहाउस निर्माण और योजना का लाभ दिलाने का भरोसा देकर उनकी जमीन से जुड़े दस्तावेज हासिल किए गए। इसके बाद उन्हीं दस्तावेजों के आधार पर बैंक ऑफ बड़ौदा से लोन स्वीकृत कराकर राशि संबंधित निजी फर्मों को जारी कर दी गई। जांच एजेंसी को संदेह है कि कई मामलों में कागजों पर निर्माण पूरा दिखाया गया, जबकि मौके पर पॉलीहाउस बने ही नहीं थे। इसी कथित प्रक्रिया के जरिए बैंक से भुगतान हासिल किए जाने का आरोप है।
कागजों में तैयार हुए पॉलीहाउस, जमीन पर निर्माण नहीं होने का आरोप
जांच में अलग-अलग फर्मों को सौंपे गए पॉलीहाउस निर्माण कार्यों में कथित अनियमितताएं सामने आई हैं।
- किसान एग्रो: फर्म को 20 पॉलीहाउस बनाने की जिम्मेदारी दी गई थी। EOW का आरोप है कि इनमें से किसी का निर्माण नहीं हुआ, लेकिन सभी 20 मामलों में कार्यपूर्णता प्रमाण पत्र तैयार कर भुगतान ले लिया गया।
- AVI Agriculture Solution Pvt. Ltd.: फर्म को पांच पॉलीहाउस बनाने थे। जांच के अनुसार, इनमें से दो का निर्माण नहीं हुआ, इसके बावजूद पांचों मामलों में भुगतान प्राप्त किया गया।
- Siran Techno India Pvt. Ltd.: फर्म पर आठ पॉलीहाउस बनाए बिना ही कार्यपूर्णता प्रमाण पत्रों के आधार पर भुगतान लेने का आरोप है।
EOW अब इन निर्माण कार्यों से जुड़े दस्तावेजों और भुगतान की प्रक्रिया की जांच कर रही है।
कार्यपूर्णता प्रमाण पत्रों की तारीखों ने बढ़ाया संदेह
जांच के दौरान कार्यपूर्णता प्रमाण पत्रों की तारीखों में भी कथित गड़बड़ी सामने आई। EOW के मुताबिक, 33 ऋण प्रकरणों में से तीन प्रमाण पत्र भुगतान वाले दिन के मिले, जबकि 12 मामलों में प्रमाण पत्र भुगतान से पहले के थे। वहीं, 16 मामलों में प्रमाण पत्र लोन स्वीकृत होने से पहले ही जारी किए गए थे। एजेंसी ने इन प्रमाण पत्रों को प्रथम दृष्टया कूटरचित माना है। जांच का अहम पहलू यह है कि निर्माण पूरा होने की पुष्टि किए बिना या लोन स्वीकृत होने से पहले ये प्रमाण पत्र किस आधार पर तैयार किए गए।
पहले से बंधक जमीन पर ₹1.90 करोड़ का लोन देने का आरोप
मामले में जमीन और बैंक की ऋण प्रक्रिया को लेकर भी गंभीर सवाल उठे हैं। EOW के अनुसार, भीलगांव निवासी नारायण सिंह की एक हेक्टेयर जमीन पहले से बैंक में बंधक थी। इसके बावजूद उसी जमीन के आधार पर बैंक की सहमति और अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) के बिना ₹1.90 करोड़ का कैश क्रेडिट लोन स्वीकृत किए जाने का आरोप है। जांच एजेंसी इस पहलू की भी पड़ताल कर रही है कि पहले से बंधक संपत्ति के आधार पर ऋण मंजूर करने की प्रक्रिया कैसे पूरी हुई और इसमें संबंधित अधिकारियों की क्या भूमिका रही।
बैंक अधिकारियों समेत 11 लोगों पर FIR, करीब ₹9.70 करोड़ की क्षति का दावा
EOW ने मामले में बैंक ऑफ बड़ौदा के तत्कालीन मुख्य शाखा प्रबंधक के.के. सरवटे, ऋण प्रबंधक शुभम सोहनी और बैंक अधिकारी चंद्रशेखर राठौड़ समेत निजी फर्मों से जुड़े लोगों को FIR में नामजद किया है। कुल 11 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। EOW के अनुसार, दोनों मामलों में बैंक को करीब 9.70 करोड़ की कथित आर्थिक क्षति हुई। फिलहाल, जांच में ऋण राशि के इस्तेमाल, दस्तावेजों की तैयारी, निर्माण की वास्तविक स्थिति और बैंक स्तर पर की गई जांच की भूमिका खंगाली जा रही है। FIR दर्ज होना आरोपों की शुरुआत है; मामले में संबंधित पक्षों की जिम्मेदारी जांच और कानूनी प्रक्रिया के बाद ही तय होगी।