
रायपुर।जल संसाधन विभाग में इन दिनों सिस्टम की उल्टी गंगा बह रही है। जूनियर अधिकारी अब ‘साहब’ की कुर्सी पर आसीन हैं। जो असल बॉस हैं, वे उसी जूनियर की मीटिंग में बैठने को मजबूर हैं। पूरा मामला जल सर्वेक्षण मंडल से निकलकर सामने आया है। यहां पदस्थ अधीक्षण अभियंता आई.ए. सिद्दीकी को मुख्य अभियंता (प्रबोधन) का अतिरिक्त प्रभार थमा दिया गया है। नया प्रभार मिलते ही समूचा विभागीय ढांचा पलट गया। वे अपने से वरिष्ठ नियमित मुख्य अभियंताओं को निर्देश जारी कर रहे हैं। बैठकों में बाकायदा उनकी क्लास ली जा रही है। वरिष्ठता और प्रशासनिक मर्यादाओं का खुला उल्लंघन जारी है। वरिष्ठ अधिकारियों के भीतर नाराजगी सुलग रही है।
जिनके अधीन नौकरी, उन्हीं से जवाब-तलब
विभागीय गलियारों में महानदी-गोदावरी कछार के मुख्य अभियंता मक्सी कुजूर का मामला सबसे अधिक चर्चा में बना हुआ है। विभागीय सेटअप को बारीकी से देखें। आई.ए. सिद्दीकी मूल रूप से अधीक्षण अभियंता हैं। वे मक्सी कुजूर के अधीन ही अपनी सेवाएं देते हैं। अतिरिक्त प्रभार के कारण कहानी बिल्कुल पलट गई। प्रभारी मुख्य अभियंता (प्रबोधन) की कुर्सी पर बैठकर वे अपने ही बॉस की बैठकें ले रहे हैं। उनसे आए दिन जवाब-तलब किया जा रहा है। सूत्रों की मानें तो इस अजीबो-गरीब हालात से सबसे ज्यादा परेशान खुद मक्सी कुजूर हैं। वे इस समूचे बर्ताव से गहरे दुख में बताए जाते हैं। जिनके नीचे काम करते हैं, जब उन्हीं की क्लास लेने की नौबत आ जाए, तो विभागीय व्यवस्था पर उंगली उठना लाजमी है।
खुद प्रस्ताव भेजना, खुद ही समीक्षा करना
विभाग के भीतर भारी घालमेल जारी है। इस बात की चर्चा जोरों पर है कि प्रस्तावों की फाइलें आई.ए. सिद्दीकी बतौर अधीक्षण अभियंता खुद आगे बढ़ाते हैं। इसके बाद वे दूसरी कुर्सी पर काबिज हो जाते हैं। यानी मुख्य अभियंता (प्रबोधन) की कुर्सी। फिर वे उन्हीं प्रस्तावों पर अपने वरिष्ठ अधिकारियों से जवाब मांगते हैं। प्रस्ताव भेजने वाला भी वही व्यक्ति। उसकी समीक्षा करने वाला भी वही व्यक्ति। विभागीय जानकार बताते हैं कि यह तो हितों के टकराव का खुला मामला है। जो अफसर फाइल चलाएगा, वही उसकी जांच करेगा, तो काम के तौर-तरीकों पर भारी संदेह पैदा होगा ही।
सभी छह मुख्य अभियंता वरिष्ठ
मौजूदा स्थिति में विभाग में कुल छह मुख्य अभियंता पदस्थ हैं। इनमें कुछ नियमित पदों पर हैं, तो कुछ प्रभारी हैं। पदानुक्रम में ये सभी के सभी श्री सिद्दीकी से ऊपर आते हैं। वे हर हाल में वरिष्ठ हैं। इसके बावजूद इन सबकी बैठकें केवल अतिरिक्त प्रभार वाला अधीक्षण अभियंता ले रहा है। यह पूरी स्थिति विभागीय पदानुक्रम को मुंह चिढ़ाने जैसी है।
दबाव और जबरन हस्ताक्षर के आरोप
अंदरखाने से कुछ और गंभीर बातें निकलकर आ रही हैं। सूत्रों का दावा है कि नए-नए एजेंडे तैयार किए जा रहे हैं। नए सर्कुलर निकाले जा रहे हैं। फिर मुख्य अभियंताओं पर भारी दबाव डालकर उन पर हस्ताक्षर कराए जा रहे हैं। इस रवैये ने सभी मुख्य अभियंताओं की चिंता काफी बढ़ा दी है। विभाग के भीतर डर का माहौल बताया जा रहा है। नौकरी और सेवा की मजबूरियां आड़े आ रही हैं। इसी वजह से कोई भी अफसर खुलकर कुछ भी बोलने से कतरा रहा है।
प्रशासनिक मर्यादा ताक पर
सरकारी कामकाज के तय नियम कायदे होते हैं। अतिरिक्त प्रभार का नियम इसलिए बना है ताकि किसी पद के खाली रहने पर रोजमर्रा का कामकाज न रुके। इसका यह मतलब कतई नहीं है कि इसके बहाने कनिष्ठ अधिकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों पर अपना अधिकार जताने लगें। जानकार बताते हैं कि जूनियर अधिकारी अगर सीनियर्स की समीक्षा करेगा, तो यह सेवा नियमों की मूल भावना के खिलाफ है। इसका नकारात्मक असर अधिकारियों के मनोबल पर पड़ रहा है। विभागीय फाइलें अटक रही हैं। निर्णयों में देरी हो रही है। अंततः इसका खामियाजा प्रदेश की जल परियोजनाओं को भुगतना पड़ सकता है।
ये मांगें उठने लगीं
पूरे प्रकरण को देखते हुए विभाग में अब निम्नलिखित मांगें उठ रही हैं:
- पहला, वरिष्ठता को ध्यान में रखते हुए मुख्य अभियंता (प्रबोधन) के प्रभार की तत्काल समीक्षा की जाए।
- दूसरा, दबाव डालकर जिन सर्कुलर और एजेंडा पर हस्ताक्षर कराए गए हैं, उसकी निष्पक्ष जांच कराई जाए।
- तीसरा, प्रस्ताव भेजने और उसकी समीक्षा करने की जो हितों के टकराव वाली व्यवस्था चल रही है, उसे बिना देरी के खत्म किया जाए।
इस पूरे घटनाक्रम में उच्च स्तर पर खामोशी छाई हुई है। विभाग के प्रमुख अभियंता, सचिव जल संसाधन और विभागीय मंत्री, किसी ने भी कुछ नहीं कहा है। उनकी चुप्पी कई तरह के संदेह पैदा करती है। इस प्रकरण में आई.ए. सिद्दीकी और विभाग का पक्ष जानने की कोशिश की जा रही है। पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।