रायपुर। सरकारी राशन व्यवस्था से निकलने वाले बारदानों को लेकर रायपुर जिले में ऐसा मामला सामने आया है, जो सरकारी संसाधनों की निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े करता है। पीडीएस दुकानों तक चावल पहुंचाने के लिए भेजे गए बारदानों को धान खरीदी के सीजन में दोबारा इस्तेमाल किया जाना है। इसके लिए उचित मूल्य दुकानदारों को हर लौटाए गए बारदाने के बदले 25 रुपए तक दिए जाते हैं। इसके बावजूद बड़ी संख्या में बारदाने विभाग तक वापस नहीं पहुंच रहे हैं।

रायपुर जिले के आंकड़े इस पूरी व्यवस्था की तस्वीर साफ करते हैं। अप्रैल से अगस्त के बीच पीडीएस के जरिए करीब 10 लाख बारदाने दुकानों तक पहुंचे, लेकिन अब तक सिर्फ करीब 5 लाख ही वापस मिले हैं। यानी आधे बारदानों का कोई हिसाब विभाग के पास नहीं है। नतीजा यह कि धान खरीदी के समय जब पुराने बारदानों की जरूरत पड़ती है, तब विभाग को नए बारदाने खरीदने पड़ते हैं और सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ आता है।

720 दुकानों में 251 ने एक भी बोरा नहीं लौटाया
रायपुर जिले में कुल 720 उचित मूल्य दुकानें संचालित हैं। इनमें 298 दुकानें शहरी और 422 ग्रामीण क्षेत्रों में हैं। उपलब्ध विभागीय आंकड़ों के मुताबिक 469 दुकानदारों ने करीब 5 लाख बारदाने वापस किए हैं, जबकि 251 दुकानदारों ने अब तक एक भी बारदाना जमा नहीं किया। यही आंकड़ा सबसे बड़ा सवाल खड़ा करता है, अगर लाखों बारदाने वापस नहीं हुए हैं तो वे आखिर गए कहां? क्या वे दुकानों में पड़े हैं, खराब हो चुके हैं या फिर खुले बाजार में बेच दिए गए? इन सवालों का स्पष्ट जवाब सामने आना अभी बाकी है।

‘चूहों ने कुतर दिए’, ‘फट गए’... यही बन रहा बचाव
बारदाने वापस नहीं करने पर कई दुकानदारों की ओर से इनके खराब होने का हवाला दिया जाता है। कहीं बारदाने फटने की बात कही जाती है तो कहीं चूहों द्वारा खराब किए जाने का दावा किया जाता है। समस्या यह है कि ऐसे दावों की वास्तविक जांच की व्यवस्था कितनी प्रभावी है, इसे लेकर सवाल बने हुए हैं। यदि कोई बारदाना वास्तव में इस्तेमाल के लायक नहीं है, तो उसका सत्यापन कैसे होता है और उसके बाद उसका निस्तारण किस तरीके से किया जाता है, इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी भी जांच के दायरे में आनी चाहिए।

सरकार को सस्ता बारदाना मिल सकता है, फिर भी खरीदना पड़ता है महंगा
इस व्यवस्था में आर्थिक नुकसान का पहलू भी अहम है। विभाग पुराने बारदानों को करीब 25 रुपए प्रति बोरे की दर से वापस लेता है, जबकि नए बारदाने खरीदने पर प्रति बोरा करीब 50 से 55 रुपए तक खर्च होने की बात सामने आई है। यानी जो बारदाना सरकारी व्यवस्था के जरिए दोबारा इस्तेमाल हो सकता था, उसके वापस नहीं आने पर विभाग को उसी जरूरत को पूरा करने के लिए लगभग दोगुनी कीमत चुकानी पड़ सकती है। रायपुर में ही करीब 10 लाख बारदानों की कीमत लगभग 5 करोड़ रुपए बैठती है। ऐसे में बड़ी संख्या में बारदाने वापस नहीं आने का असर सिर्फ स्टॉक पर नहीं, बल्कि सरकारी बजट पर भी पड़ता है।

बाजार में 10 से 20 रुपए तक बिकने की बात
पुराने बारदानों की बाजार में भी मांग है। कारोबार से जुड़े लोगों के मुताबिक गुणवत्ता और हालत के आधार पर पुराने बारदाने करीब 10 से 20 रुपए तक में खरीदे-बेचे जाते हैं। ऐसे में सरकारी बारदानों की निगरानी कमजोर होने पर उनके खुले बाजार में पहुंचने की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता है।हालांकि, किसी खास दुकान या दुकानदार द्वारा सरकारी बारदाना बेचने की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकती है।

अब सबसे बड़ा सवाल, लाखों बारदानों का हिसाब कौन देगा?
एक तरफ सरकार पुराने बारदानों को वापस लेकर धान खरीदी में उनका इस्तेमाल कर लागत घटाना चाहती है, दूसरी तरफ बड़ी संख्या में बारदाने विभाग तक पहुंच ही नहीं रहे। रायपुर में 251 दुकानों से एक भी बारदाना वापस नहीं आना इस पूरी व्यवस्था की निगरानी पर बड़ा सवाल है। अब जरूरत सिर्फ बारदाने वापस मंगाने की नहीं, बल्कि यह पता लगाने की भी है कि जो बारदाने गायब हैं, उनका इस्तेमाल कहां हुआ। यदि किसी स्तर पर सरकारी सामग्री की बिक्री या जानबूझकर वापसी नहीं करने की पुष्टि होती है, तो जिम्मेदारी तय कर कार्रवाई करना भी जरूरी होगा।