
बिलासपुर के पुलिस मैदान में स्वाधीनता दिवस का मुख्य समारोह इस बार राष्ट्रभक्ति से ज्यादा 'अव्यवस्था' और 'अपमान' के लिए चर्चा में है। इस बार भाजपा के ही बड़े पदाधिकारियों को जिस तरह से वीआईपी गेट पर ब्रेक किया गया, उसे देखकर ऐसा लगा मानो प्रशासन ने अतिथियों की पहचान न करने का कोई नया प्रशिक्षण ले लिया हो। विशेष रूप से नगर विधायक अमर अग्रवाल के खास समर्थकों के साथ हुए दोयम दर्जे के व्यवहार की चर्चा पूरे शहर में है।
कैसे शुरू हुआ विवाद
हर वर्ष 15 अगस्त और 26 जनवरी को पुलिस मैदान में यह आयोजन होता है। पहले आम से लेकर खास लोगों, पार्षदों और मोहल्ला समितियों तक को बाकायदा न्योता भेजा जाता रहा है । लेकिन इस बार यह व्यवस्था शायद प्रशासन ने बंद कर दी है। हालांकि, केंद्रीय राज्य मंत्री के ध्वजारोहण कार्यक्रम को देखते हुए जिला भाजपा अध्यक्ष दीपक सिंह ने अपने खास और पार्टी के प्रमुख लोगों को आमंत्रित किया था। इसी बुलावे पर विधायक अमर अग्रवाल के समर्थक ज्यादा बड़ी संख्या में पहुंच गए, लेकिन यहां उनके स्वागत के लिए कुछ भी नहीं था।
वीआईपी गेट पर हाईवोल्टेज ड्रामा
मामला तब बिगड़ा जब केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू का काफिला छत्तीसगढ़ भवन से मुख्य समारोह स्थल पहुंचा।
० गेट पर तैनात एक राजस्व अधिकारी (आरआई या तहसीलदार) ने जिला भाजपा कोषाध्यक्ष गुलशन ऋषि को अचानक अंदर जाने से रोक दिया।
०मौजूद लोगों के मुताबिक, अधिकारी ने उनका हाथ पकड़कर उन्हें पीछे खींचा, जिससे वे हड़बड़ा ( लड़खड़ा )गए। फिर क्या था श्री गुलशन ऋषि जी आगबबूले हो गये और अधिकारियों पर बरस पड़े।
०इस दौरान मची धक्का मुक्की और अफरातफरी के बीच एक महिला पुलिसकर्मी और दो भाजपा महिला नेत्रियों को भी मामूली चोटें आईं।
०पूरी घटना से नाराज युवा जिलाध्यक्ष दीपक सिंह ने मौके पर ही अधिकारियों को जमकर क्लास लगाई।
बैठेंगे किसमें कुर्सियों का टोटा नेताओं को होना पड़ा वापस।
गेट के बाहर कम अंदर का नजारा भी देखेंने योग्य था। निगम सभापति विनोद सोनी हों या महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष हर्षिता पांडेय, किसी को भी उनके प्रोटोकॉल अनुसार जगह नसीब नहीं हुई। चर्चा है प्रशासन ने कुर्सियां गिनकर ही मंगवाई थीं। अपनी ही सरकार के कार्यक्रम में इस कदर हुई घोर बेईज्जती से नाराज होकर कई छुटभैया और पार्षद सहित कार्यकर्ता बीच कार्यक्रम से ही बैरंग लौट गए।
गुटबाजी की चर्चा तेज
इस पूरे घटना क्रम से भाजपा के अंदर की अंदरूनी राजनीति भी सामने आ गई है। चर्चा है कि क्या ये सब महज एक संयोग था या फिर किसी के इशारे पर लिखी गई कोई स्क्रिप्ट पुराना दौर था जब अमर अग्रवाल मंत्री थे, तब किसी अधिकारी की ऐसी जुर्रत नहीं होती थी कि उनके लोगों की तरफ आंख उठाकर भी देख ले। अब समय बदल गया है, तो शायद प्रशासन का चश्मा भी बदल गया है। यह समझ से परे है कि ऐसे अधिकारियों की ड्यूटी मुख्य द्वार पर क्यों लगाई गई, जो शहर के सत्ताधारी चेहरों तक को नहीं पहचानते। इस पूरी घटना से प्रशासन की खूब भद्द पिटी है। विधायक अमर अग्रवाल खेमे के साथ हुए इस बर्ताव की गूंज इतनी जल्दी शांत होने वाली नहीं लगती।