सत्ता बदलती है, चेहरे बदलते हैं, लेकिन सिस्टम के गलियारों में चलने वाला 'खेल' कभी नहीं बदलता। आइए आज आपको सिस्टम के भीतर चल रहे कुछ ऐसे ही दिलचस्प और चौंकाने वाले खेलों से रूबरू कराते हैं, जिनकी चर्चा बंद कमरों में तो खूब है, लेकिन कार्रवाई की फाइलों में सन्नाटा पसरा है।

स्वास्थ्य विभाग में 'अमित' छाप वसूली

कहने को तो आईएएस अफसर जनहित के लिए होते हैं, लेकिन यहां चर्चा एक अफसर के 'ब्रदर' की है, जिनका नाम 'अमित' है। जनहित के कामों में इनकी छाप भले ही नजर न आए, लेकिन स्वास्थ्य विभाग के वसूली व्यवसाय में इनकी छाप सचमुच 'अमिट' हो चुकी है। मंत्रालय से लेकर संचालनालय तक दबी जुबान में चर्चा है कि सर्जिकल सामानों की खरीदी में करोड़ों का कमीशन काटा गया है। यह 'सर्जिकल स्ट्राइक' सीधे सरकारी खजाने पर हो रही है, मगर सरकार सब कुछ जानकर भी खामोश बैठी है।

कमाई का आलम यह है कि शहर के सबसे पॉश इलाके 'स्वर्णभूमि' में इसी काली कमाई से दो आलीशान बंगले (नंबर 132 और 133) खड़े कर दिए गए हैं। बंगलों की शानो-शौकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अंदर की नक्काशी और कीमती फर्नीचर के लिए खास सागौन (टीक वुड) सीधे बीजापुर के जंगलों से मंगाया गया है। सवाल यह है कि इस शाही शौक के पीछे का 'रसूख' आखिर सरकार को क्यों नहीं दिख रहा?

नशे में 'उड़ता' अफसर

स्वर्णभूमि के बंगलों की चकाचौंध के बीच एक और हैरान करने वाली चर्चा जोरों पर है। मंत्रालय के गलियारों में सवाल गूंज रहा है कि आखिर वो कौन सा रसूखदार अफसर है, जो बिना ड्रग्स लिए दफ्तर ही नहीं आता? जनाब इतने 'हाई' रहते हैं कि नशे की खुमारी में ही सरकारी फाइलें निपटाई जा रही हैं। दफ्तर के चपरासी से लेकर मातहतों तक सबको इस 'उड़ते अफसर' की हकीकत पता है, लेकिन बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे?

महादेव का 'कृपापात्र' खाकीवाला

अब बात पुलिस महकमे की। महादेव सट्टा ऐप का जिन्न फिर बोतल से बाहर आ गया है। इस ऐप का किंगपिन, जो सालों तक जेल की हवा खा चुका है और जिस पर छत्तीसगढ़ से लेकर मुंबई तक कई संगीन अपराध दर्ज हैं, उसका एक खास आईपीएस अफसर के साथ गहरा याराना रहा है। चर्चा है कि यह किंगपिन बकायदा इस खाकी वाले को मोटा कमीशन पहुंचाता था।

हैरानी की बात यह है कि सट्टे के सरगना से इतने गहरे तार जुड़े होने के बावजूद, पुलिस विभाग ने आज तक उस अफसर को निलंबित करने की जहमत नहीं उठाई। आखिर इस मेहरबानी के पीछे का राज क्या है? कौन सी अदृश्य शक्ति है जो इस दागदार चेहरे को आज भी सिस्टम का अहम हिस्सा बनाए हुए है?

ओएसडी का 'निलंबन' वाला रहस्य

सिस्टम की दरियादिली का सबसे बड़ा उदाहरण पिछली सरकार के करीबियों पर उमड़ रहा प्यार है। पूर्व मुख्यमंत्री के ओएसडी रहे डिप्टी कलेक्टर रैंक के एक अधिकारी पूरे चार साल जेल की रोटियां तोड़ने के बाद अब जमानत पर रिहा होकर बाहर आए हैं। नियम-कायदों की किताब चीख-चीख कर कहती है कि ऐसे अफसर को तुरंत निलंबित किया जाना चाहिए, लेकिन मौजूदा सरकार ने अब तक निलंबन का आदेश जारी नहीं किया है।

प्रशासनिक हलकों में अब यह सवाल आग की तरह फैल रहा है कि आखिर नई सरकार, पिछली सरकार के चहेतों पर इतनी मेहरबान क्यों है? क्या यह महज लालफीताशाही की सुस्ती है, या फिर सरकार के भीतर ही बैठे कुछ लोग मौजूदा सरकार को बदनाम करने की कोई गहरी साजिश रच रहे हैं? तीर तो कमान से निकल चुके हैं, बस देखना यह है कि निशाना असल में कहां लगता है!