
बिलासपुर : महात्मा गांधी का नाम आते ही चरखा, सत्याग्रह, अहिंसा और आजादी की लड़ाई की तस्वीर आंखों के सामने उभरती है। लेकिन गांधी के जीवन में कुछ ऐसे छोटे-छोटे किस्से भी छिपे हैं, जो किताबों में दर्ज होने के बावजूद आम चर्चा से दूर रह गए। ऐसा ही एक दिलचस्प प्रसंग उस समय का है, जब गांधी ‘महात्मा’ नहीं बने थे और दक्षिण अफ्रीका से भारत लौट रहे एक युवा बैरिस्टर थे।
साल 1896 गांधी समुद्र के रास्ते भारत लौट रहे थे। जहाज का सफर करीब 24 दिनों का था। इतने लंबे सफर में कोई व्यक्ति आराम करे, समय बिताए या समुद्र को निहारता रहे, यह स्वाभाविक है। लेकिन गांधी ने इस यात्रा को भी अपने लिए सीखने का अवसर बना लिया। जहाज पर एक मुस्लिम यात्री से उन्होंने उर्दू सीखना शुरू किया। तमिल भाषा सीखने के लिए उन्होंने 'तमिल सेल्फ टीचर' नाम की पुस्तक का सहारा लिया। लेकिन इस कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा अभी बाकी था।
हर दिन एक घंटे... शतरंज की चेसबोर्ड पर गांधी
इसी समुद्री यात्रा के दौरान गांधी जहाज के एक अंग्रेज अधिकारी के साथ रोज करीब एक घंटे शतरंज खेलते थे। हर दिन समय निकालकर शतरंज की चेसबोर्ड पर सामने बैठे अंग्रेज अधिकारी की चाल का जवाब दे रहे। गांधी के जीवन का यह पक्ष भी दिलचस्प है, गाँधी उस ऐतिहासिक व्यक्तित्व के पीछे एक ऐसा युवा भी थे, जिसकी जिज्ञासा हर नई चीज को सीखने के लिए बेचैन रहती थी।
उर्दू क्यों सीखना चाहते थे गांधी?
यह केवल भाषा सीखने का शौक नहीं था। गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में अपने अनुभवों से महसूस किया था कि वहां भारतीय समुदाय के अलग-अलग वर्गों से जुड़ने के लिए भाषाओं को समझना जरूरी है। उनके अपने संस्मरण में भी इस यात्रा के संदर्भ में उर्दू और तमिल सीखने की कोशिश का उल्लेख मिलता है। उर्दू सीखने के लिए उन्हें एक उर्दू शिक्षक भी मिला। दिलचस्प बात यह थी कि जिस अंग्रेज अधिकारी के साथ वे शतरंज खेलते थे, वह भी उर्दू पढ़ रहा था। दोनों के बीच सीखने का एक अलग ही रिश्ता बन गया था। गांधी ने बाद में इस यात्रा को याद करते हुए लिखा कि अधिकारी की याददाश्त उनसे बेहतर थी और वह एक बार देखे शब्द को आसानी से याद कर लेता था। गांधी को उर्दू के अक्षरों को समझने में अधिक मेहनत करनी पड़ती थी, लेकिन उन्होंने अपनी लगन और निरंतर प्रयास से सीखना जारी रखा।
यह सिर्फ यात्रा नहीं, गांधी के व्यक्तित्व की झलक थी
1896 की यह यात्रा उस गांधी की तस्वीर सामने लाती है, जिसे आमतौर पर गांधी जयंती के अवसर पर नहीं देखा जाता। एक तरफ दक्षिण अफ्रीका में नस्लीय भेदभाव के अनुभव उनके जीवन को भीतर से बदल रहे थे। दूसरी तरफ वे भाषाएं सीख रहे थे, किताबें पढ़ रहे थे और शतरंज खेल रहे थे। यही वह दौर था जब गांधी के व्यक्तित्व में कई चीजें एक साथ आकार ले रही थीं। लोगों को समझना, अलग-अलग समुदायों से जुड़ना और परिस्थितियों को ध्यान से देखना। आगे जाकर यही गांधी सत्याग्रह के जरिए दुनिया के सामने एक अलग राजनीतिक और नैतिक रास्ता रखते दिखाई दिए। लेकिन उस गांधी तक पहुंचने से पहले एक लंबी यात्रा थी और उस यात्रा में समुद्र के बीच शतरंज की चेसबोर्ड भी थी।
किताब में दर्ज है गांधी का यह ‘अनदेखा’ रूप
गांधी के पोते और लेखक राजमोहन गांधी ने अपनी चर्चित पुस्तक "द गुड बोटमैन: ए पोर्ट्रेट ऑफ गांधी" में गांधी के जीवन के कई कम चर्चित पहलुओं को सामने रखा है। पुस्तक का उद्देश्य भी गांधी की उस छवि से आगे जाकर उनके व्यक्तित्व को समझना है, जो केवल मूर्तियों और प्रचलित किस्सों तक सीमित रह गई है। इसी प्रसंग पर राजमोहन गांधी के लेख ‘द गांधी यू मे नॉट नो’ में 1896 की उस समुद्री यात्रा का उल्लेख मिलता है, जहां गांधी ने 24 दिनों के दौरान एक मुस्लिम यात्री से उर्दू सीखी, ‘टेमिल सेल्फ-टीचर’ से तमिल पढ़ी और एक अंग्रेज अधिकारी के साथ प्रतिदिन करीब एक घंटे शतरंज खेला।
महात्मा बनने से पहले का वह युवा गांधी
गांधी जयंती पर हम उन्हें राष्ट्रपिता, स्वतंत्रता आंदोलन के महानायक और अहिंसा के प्रतीक के रूप में याद करते हैं। लेकिन गांधी को समझने के लिए उनके जीवन की ऐसी छोटी घटनाओं को जानना भी जरूरी है। यह कहानी किसी बड़े आंदोलन की नहीं है। इसमें कोई भाषण नहीं, कोई जुलूस नहीं और कोई सत्याग्रह नहीं। फिर भी यह गांधी के व्यक्तित्व का एक ऐसा पहलू सामने लाती है, जिसमें एक बात साफ दिखाई देती है कि वे जहां भी रहे, सीखते रहे और शायद यही वजह है कि समुद्र के बीच शतरंज खेलता वह युवा बैरिस्टर, कुछ दशकों बाद पूरी दुनिया के लिए महात्मा गांधी बन गया।