रायपुर । छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में जिला 7के सहकारी बैंक का 28 करोड़ का भारी-भरकम घोटाला अब एक ऐसे मोड़ पर आ गया है, जिसने कई रसूखदारों की नींद उड़ा दी है। कुसमी और शंकरगढ़ शाखाओं में हुए इस संगठित 'खेल' में अब प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने सीधी एंट्री मार दी है। अब तक मामले को स्थानीय कार्रवाई बताकर छोटे कर्मचारियों पर गाज गिराने तक सीमित माना जा रहा था, लेकिन जांच एजेंसी के एक औपचारिक पत्र ने पूरे सहकारिता महकमे में हड़कंप मचा दिया है। ईडी ने बैंक प्रबंधन से फर्जी खातों और ट्रांजैक्शन का पूरा कच्चा-चिट्ठा तलब किया है।

 

आदिवासी समिति के नाम पर करोड़ों का 'फर्जीवाड़ा

 

इस पूरे घोटाले का सबसे खौफनाक पहलू वह तरीका है, जिससे सिस्टम की आंखों में धूल झोंकी गई। भ्रष्ट तंत्र ने आदिवासियों के नाम का इस्तेमाल ढाल के रूप में किया। 'आदिम जाति सहकारी समिति, जमडी' के नाम पर बिना किसी वैध दस्तावेज, बिना केवाईसी और बिना वेरिफिकेशन के एक फर्जी खाता खोल दिया गया। सिर्फ इसी एक भूतिया खाते के जरिए 19 करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम पार कर दी गई। बड़ा सवाल यह है कि बैंक के आला अधिकारियों और ऑडिटर्स को इतने लंबे समय तक इस फर्जीवाड़े की भनक कैसे नहीं लगी? क्या यह सब एक सुनियोजित 'नेक्सस' का हिस्सा था, जिसमें ऊपर से नीचे तक कमीशन फिक्स था?

 

12 मोहरे नपे, पर 'वजीर' अभी भी पर्दे के पीछे

 

पुलिस और प्रशासन ने अब तक कार्रवाई करते हुए शाखा प्रबंधक अशोक कुमार सोनी समेत 12 कर्मचारियों को सलाखों के पीछे भेजा है, जबकि चार अधिकारियों को बर्खास्त कर अपनी पीठ थपथपा ली है। लेकिन, 28 करोड़ रुपये का यह सुनियोजित गबन सिर्फ शाखा स्तर के कर्मचारियों के बूते संभव नहीं है। बिना किसी राजनीतिक या उच्च प्रशासनिक संरक्षण के इतना बड़ा सिंडिकेट सालों तक काम नहीं कर सकता। ईडी अब इसी 'मनी ट्रेल' (पैसों के लेन-देन के रास्ते) की जांच करेगी, जिससे यह साफ होगा कि घोटाले का पैसा आखिर किन सफेदपोशों की तिजोरियों तक पहुंचा है।

 

ED की चिट्ठी से बैंक मुख्यालय में उड़े होश

 

ईडी के पत्र के बाद जिला केंद्रीय सहकारी बैंक मुख्यालय में दस्तावेजों को खंगालने का काम युद्ध स्तर पर चल रहा है। बैंक के सीईओ श्रीकांत चंद्राकर ने भी पुष्टि कर दी है कि ईडी का पत्र मिल चुका है और जांच एजेंसी की डिमांड के मुताबिक रिपोर्ट तैयार की जा रही है। ईडी का मुख्य फोकस प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) के तहत यह पता लगाना है कि इस काले धन को कहां और कैसे निवेश किया गया।