बिलासपुर जिले के तखतपुर ब्लॉक का सरकारी स्कूल इन दिनों खासी चर्चा में बना हुआ है। अमूमन जिन आदिवासी अंचलों के स्कूलों में सिर्फ बुनियादी सुविधाओं का रोना रोया जाता है, वहीं पाली शासकीय हाई स्कूल की प्रभारी प्राचार्य व व्याख्याता डॉ. रश्मि सिंह धुर्वे ने अपनी नई सोच से अलग ही पहचान बनाई है। उन्होंने हाल ही में 'किशोरावस्था में पोषण एवं स्वास्थ्य : अवधारणा, घटक, मूल्यांकन एवं शैक्षिक महत्व' नाम से पुस्तक प्रकाशित की है। यह किताब सिर्फ पन्नों का पुलिंदा नहीं है, बल्कि इसमें किशोरों के स्वास्थ्य, उनके खान-पान और स्कूली शिक्षा के आपसी रिश्ते को बड़ी बारीकी से उकेरा गया है।

वातानुकूलित कमरों में बनने वाली नीतियों से इतर है हकीकत

अक्सर शिक्षा विभाग की नीतियां बड़े सरकारी कार्यालयों में बैठकर तैयार कर दी जाती हैं, लेकिन ग्राउंड जीरो पर बच्चों को वास्तव में क्या मिलना चाहिए, इसकी समझ विरले लोगों को होती है। किताब के पन्नों में विद्यार्थियों के भीतर स्वस्थ पोषण संबंधी आदतें विकसित करने पर बातें है। अपनी पुस्तक के माध्यम से डॉ. धुर्वे ने यह बताने का प्रयास किया है कि अगर बच्चों का स्वास्थ्य और पोषण सही होगा, तभी शिक्षा का स्तर भी सुधरेगा। खाली पेट या कुपोषण के शिकार बच्चों को किताबें थमा देने से वे होनहार नहीं बन जाते।

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दायरा सिर्फ स्कूल तक सीमित नहीं

डॉ. धुर्वे का कामकाज सिर्फ स्कूल की घंटी बजने तक सीमित नहीं है। आदिवासी इलाकों में शिक्षा और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता फैलाने का जो काम वह कर रही हैं, वह उन विभागीय अफसरों के लिए भी सबक है जो सिर्फ फाइलों में आंकड़े सुधारने में लगे रहते हैं। ग्रामीण अंचलों में आज भी कई भ्रांतियां हैं, जिन्हें दूर करने के लिए लगातार प्रयास की आवश्यकता होती है। उन्होंने छात्राओं की माहवारी संबंधित झिझक और समस्याओं को दूर करने के लिए स्कूल में कम लागत वाला माहवारी प्रबंधन इन्सीनेटर बनवाया।

यूनिसेफ ने भी माना मॉडल

स्कूल के भीतर तैयार हुआ यह इन्सीनेटर कोई मामूली उपलब्धि नहीं थी। इसे देखकर यूनिसेफ की टीम भी प्रभावित हुई और उसने इस प्रयोग को बाकायदा मॉडल के रूप में मान्यता दे दी। ग्रामीण इलाकों में माहवारी को लेकर आज भी खुलकर बात नहीं होती। ऐसे में स्कूल आने वाली लड़कियों को कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता था। कई बार तो छात्राएं स्कूल आने से भी कतराती थीं। इस समस्या को समझते हुए ही डॉ. रश्मि ने स्कूल प्रांगण में वह व्यवस्था खड़ी कर दी, जिसने छात्राओं के लिए बड़ी सहूलियत पैदा कर दी। अक्सर करोड़ों की ग्रांट वाले बड़े प्रोजेक्ट जो काम नहीं कर पाते, वह काम स्कूल के भीतर इस कम लागत वाले जुगाड़ ने कर दिखाया।

सम्मान यूं ही नहीं मिलते

सरकारी तंत्र में रहकर उसी तंत्र की खामियों को कैसे दूर किया जाता है, डॉ. रश्मि इसका बेहतरीन उदाहरण पेश कर रही हैं। यही वजह है कि उनके इन्हीं प्रयासों को देखते हुए उन्हें राज्यपाल पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है। यह सम्मान उनके उसी संघर्ष का नतीजा है जो उन्होंने आदिवासी अंचलों के बच्चों का भविष्य संवारने में लगाया है। जब भी पढ़ाई के गिरते स्तर पर बातें होती हैं, तब डॉ. धुर्वे के नवाचार बताते हैं कि अगर शिक्षक ठान ले, तो पूरी तस्वीर बदल सकती है।