
बिलासपुर : वैवाहिक रिश्तों में अनबन और मनमुटाव होना अपने आप में तलाक का आधार नहीं बन सकता। मानसिक क्रूरता और परित्याग के आरोप साबित करने के लिए ठोस साक्ष्य जरूरी हैं। इसी कानूनी सिद्धांत को स्पष्ट करते हुए हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने पति की तलाक याचिका खारिज करने के फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। अदालत ने साफ किया कि आपसी सहमति से तलाक की प्रक्रिया शुरू होने के बाद किसी पक्ष का अपनी सहमति वापस लेना भी अपने आप में मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता। मामला जगदलपुर निवासी संजीव गुरुवारा और उनकी पत्नी पूर्णिमा खरे गुरुवारा (हेमा खरे) के बीच लंबे समय से चल रहे वैवाहिक विवाद से जुड़ा है। पति ने बस्तर स्थित फैमिली कोर्ट में याचिका दायर कर पत्नी पर मानसिक प्रताड़ना, बार-बार विवाद करने और झूठे आपराधिक मामलों में फंसाने की धमकी देने जैसे आरोप लगाए थे। उनका दावा था कि वैवाहिक कलह से परेशान होकर वे जुलाई 2018 से घर छोड़कर अलग रहने लगे थे।
बच्चों की गवाही से खोली पिता की पोल
मामले की सुनवाई के दौरान दंपति के बालिग बच्चों की गवाही अहम साबित हुई। बच्चों ने अदालत को बताया कि उनके पिता नियमित रूप से घर आते थे और परिवार के साथ बैठकर भोजन भी करते थे। इस गवाही से पति के उस दावे की पोल खुल गई हैं, जिसमें उन्होंने लंबे समय से परिवार से पूरी तरह अलग रहने की बात कही थी। वहीं, पत्नी ने पति के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उन्होंने ही पत्नी और बच्चों की उपेक्षा की तथा उनके साथ मारपीट और दुर्व्यवहार किया।
सिर्फ रिश्तों में कड़वाहट तलाक का आधार नही
डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह अधिनियम के तहत मानसिक क्रूरता और परित्याग जैसे आधारों पर तलाक मांगने वाले पक्ष को अपने आरोपों के समर्थन में ठोस सबूत पेश करने होते हैं। अदालत के अनुसार, इस मामले में पति अपने आरोपों को पर्याप्त साक्ष्यों के आधार पर साबित करने में नाकाम रहे। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि आपसी सहमति से तलाक की कार्यवाही शुरू होने के बाद यदि कोई पक्ष अपनी सहमति वापस ले लेता है, तो केवल इस वजह से उसे मानसिक क्रूरता नहीं कहा जा सकता। वैवाहिक संबंधों में खटास आना, मतभेद बढ़ना या रिश्ता सामान्य रूप से नहीं चल पाना भी अपने आप में तलाक मंजूर करने का स्वतंत्र कानूनी आधार नहीं है।
फैमिली कोर्ट का फैसला बरकरार
ठोस साक्ष्यों के अभाव और कानूनी आधारों के कारण पति को राहत नहीं मिली। डिवीजन बेंच ने 8 दिसंबर 2023 के फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए याचिका खारिज कर दी।