बिलासपुर : छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित शराब और मैनपावर सप्लाई घोटाले में आरोपी पूर्व आबकारी एमडी अरुणपति त्रिपाठी को हाईकोर्ट से कानूनी राहत मिली है। हाईकोर्ट ने उनकी जमानत याचिका स्वीकार कर ली है। वे पिछले 95 दिनों से रायपुर सेंट्रल जेल में बंद थे। करीब 183 करोड़ रुपये के कथित अतिरिक्त भुगतान और कमीशनखोरी के आरोपों से घिरे इस मामले में जमानत मिलने के बाद अब उनके जेल से बाहर आने का रास्ता साफ हो गया है। मामला सरकारी शराब दुकानों में कर्मचारियों की आपूर्ति करने वाली मैनपावर एजेंसियों को किए गए भुगतान में कथित भारी अनियमितता से जुड़ा है। जांच एजेंसियों का आरोप है कि ओवरटाइम, बोनस, चार अतिरिक्त कार्य दिवस और सर्विस चार्ज जैसे मदों में फर्जी एवं बढ़े हुए बिल तैयार कर सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये का अतिरिक्त भुगतान कराया गया।

182.98 करोड़ का भुगतान, कर्मचारियों को नहीं मिला लाभ

जांच एजेंसियों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2019-20 से 2023-24 के बीच मैनपावर एजेंसियों को इन मदों के नाम पर करीब 182.98 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भुगतान किया गया। आरोप है कि कागजों में कर्मचारियों के ओवरटाइम, बोनस और अतिरिक्त कार्य दिवसों का हिसाब बढ़ाकर दिखाया गया, जबकि वास्तविक कर्मचारियों को इसका पूरा लाभ नहीं मिला। जांच में अरुणपति त्रिपाठी के कार्यकाल के दौरान करीब 152.40 करोड़ रुपये के अतिरिक्त भुगतान का आरोप भी सामने आया है। एजेंसियों का दावा है कि भुगतान की इस पूरी प्रक्रिया में अधिकारियों, प्लेसमेंट एजेंसियों और कथित सिंडिकेट के बीच मिलीभगत थी।

28.80 लाख की नकदी से खुली जांच की परतें

इस मामले की जांच की शुरुआत 29 नवंबर 2023 को हुई थी। ईडी ने रायपुर में कार्रवाई के दौरान तीन लोगों के पास से 28.80 लाख रुपये नकद जब्त किए थे। जांच एजेंसी को संदेह था कि यह रकम मैनपावर एजेंसियों के लंबित बिल पास कराने के बदले दिए जाने वाले कथित कमीशन से जुड़ी है। इसके बाद सामने आए तथ्यों के आधार पर ईओडब्ल्यू और एसीबी ने भी मामला दर्ज कर जांच शुरू की। जांच का दायरा बढ़ने के साथ मैनपावर एजेंसियों के संचालकों और अन्य संबंधित लोगों की भूमिका भी जांच के घेरे में आई।

बिल बढ़ाकर भुगतान लेने का आरोप

जांच एजेंसियों के अनुसार कथित गड़बड़ी का तरीका यह था कि कर्मचारियों के वास्तविक कार्य और भुगतान के आंकड़ों से छेड़छाड़ कर ओवरटाइम, बोनस और चार अतिरिक्त कार्य दिवसों के नाम पर बढ़े हुए बिल तैयार किए जाते थे। इन बिलों को भुगतान के लिए प्रस्तुत किया जाता और सरकारी राशि जारी कराई जाती थी। यह भी आरोप है कि इस प्रक्रिया से हासिल अतिरिक्त रकम का एक हिस्सा नकद कमीशन के रूप में अधिकारियों और कथित सिंडिकेट तक पहुंचाया गया। हालांकि, इन आरोपों की अंतिम पुष्टि न्यायालय में साक्ष्यों के परीक्षण के बाद ही होगी।

जमानत मिली, लेकिन घोटाले की जांच और मुकदमा बाकी

इस मामले में ईओडब्ल्यू और एसीबी ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अलावा धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक साजिश से जुड़ी धाराओं के तहत कार्रवाई की है। मैनपावर एजेंसियों के संचालकों समेत कई संबंधित लोगों की भूमिका की भी जांच की गई है।