
छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक और सियासी गलियारों में इन दिनों आबकारी विभाग की एक कॉकटेल चर्चा खूब सुर्खियां बटोर रही है। मंत्रालय से लेकर जिले की चाय दुकानों तक, हर जगह आबकारी के दो सब-इंस्पेक्टर चर्चा का हॉट टॉपिक बने हुए हैं। वैसे तो इन दोनों पर आदिवासी इलाकों में अवैध वसूली और डराने-धमकाने के आरोप काफी पुराने हैं, लेकिन इस बार इन्होंने सीधे 'सिस्टम' की दुखती रग पर हाथ रख दिया है।
राष्ट्रपति के दत्तक पुत्रों से पंगा
कहानी में नया बखेड़ा तब खड़ा हुआ जब विभाग की एक कथित कार्रवाई के बीच से एक बैगा आदिवासी युवक अचानक गायब हो गया। बैगा, जिन्हें देश के राष्ट्रपति ने गोद ले रखा है उनसे कोरे कागज पर अंगूठा लगवाने और फर्जी केस में जेल भेजने की धमकियों ने मामले को तूल दे दिया है। लापता युवक के परिजन शिकायतें लेकर घूम रहे हैं, लेकिन मजाल है कि स्थानीय प्रशासन की कुंभकर्णी नींद टूट जाए!
निलंबन की तलवार और 'हम तो डूबेंगे सनम...
नियम-कायदों की बात करें तो इतनी बड़ी लापरवाही के बाद दोनों दारोगाओं पर तुरंत निलंबन की गाज गिरनी चाहिए थी। लेकिन साहब, ये कोई आम कर्मचारी नहीं हैं! अंदरखाने की पक्की खबर है कि इन दोनों ने अपने ही सीनियर अफसरों पर रिवर्स प्रेशर बनाना शुरू कर दिया है। दोनों ने साफ संदेश भिजवा दिया है कि अगर हम पर निलंबन की कार्रवाई हुई, तो हम भी चुप नहीं बैठेंगे। अपने ही अफसरों को झूठी कहानियों के जाल में ऐसा फंसाएंगे कि जवाब देते नहीं बनेगा।
मुख्यालय वाले बड़े साहब का फुल सपोर्ट
अब आप सोच रहे होंगे कि महज दो सब-इंस्पेक्टरों में सिस्टम को आंख दिखाने की इतनी हिम्मत कहां से आई? दरअसल, इनके सिर पर मुख्यालय में बैठे एक बेहद रसूखदार बड़े साहब का वरदहस्त है। चर्चा है कि ये दोनों दारोगा भूपेश बघेल सरकार के समय दुकान प्रभारी हुआ करते थे। आबकारी महकमे में हर कोई जानता है कि उस दौर में "कितना माल कहां से आता था और कहां जाता था, इसका पूरा लेखा-जोखा इन्हीं के पास है।
शराब घोटाले के असली राजदार एसीबी को गच्चा
इस पूरी गपशप का सबसे क्लाइमेक्स वाला हिस्सा है शराब घोटाला। जब एसीबी (ACB) की टीम ने शराब घोटाले में ताबड़तोड़ कार्रवाइयां कीं, तो ये दोनों दारोगा खुद को अभी-अभी आए फ्रेशर बताकर बड़ी सफाई से बच निकले थे। इतना ही नहीं, जांच एजेंसी ने इन्हें सरकारी गवाह भी बना दिया। जबकि हकीकत यह है कि पूरे घोटाले का कच्चा-चिट्ठा इन्हीं के पास मौजूद है। अब मुख्यालय वाले बड़े साहब इसी डर के मारे कमिश्नर और सचिव पर दबाव बना रहे हैं कि इन दोनों पर भूलकर भी कोई कार्रवाई न की जाए। साहब को धुकधुकी लगी हुई है कि अगर ये दारोगा नपे, तो कहीं शराब घोटाले में निलंबित उन 22 अफसरों के साथ-साथ उनके भी कई गहरे राज बाहर न आ जाएं!
आगे-आगे देखिए होता है क्या...
फिलहाल तो जिले से लेकर रायपुर के नवा रायपुर तक इस मामले की गर्माहट महसूस की जा रही है। लोग बस यही जानना चाहते हैं कि वो लापता आदिवासी युवक आखिर है कहां? और क्या सिस्टम इस ब्लैकमेलिंग के आगे घुटने टेक देगा, या फिर जांच की आंच उन 'सरकारी गवाहों' तक भी पहुंचेगी जो आज अपने ही विभाग की पोल खोलने की धमकी दे रहे हैं? खैर, आबकारी की इस बिसात पर अगला मोहरा कौन सा चलेगा, यह देखना बेहद दिलचस्प होगा!