बिलासपुर का आबकारी विभाग इन दिनों किसी सस्पेंस फिल्म की तरह नजर आ रहा है। मामला सिर्फ सामान्य क्लर्क के ट्रांसफर का नहीं है बल्कि इसके पीछे छिपे करोड़ों के काले साम्राज्य को बचाने का है।

 इसी सल्तनत को सुरक्षित रखने फर्जी लेटर का खेल खेला गया है। ऊपर बैठे अधिकारी आश्चर्यचकित हैं कि आखिर अपनी कुर्सी बचाने के लिए मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव तक अपने अधिकारी के नाम की फर्जी चिट्ठी किसने पहुंचा दी। आखिर वह कौन है जो सरकार की आंखों में धूल झोंक रहा है?

कहानी ने ट्विस्ट तब आया जब मंत्रालय में मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव और आबकारी मंत्री के दरबार में शिकायत पहुंचती है। पत्र भेजने वाले के स्थान पर प्रभारी सहायक आयुक्त (बिलासपुर) नवनीत तिवारी का नाम लिखा था। पत्र का प्रसंग ऐसा था जिसे पढ़कर अच्छे अच्छे के पसीने छूट जाएं। इस लेटर में वर्णित था कि मुख्य लिपिक दिनेश दुबे का ट्रांसफर बिलासपुर से बलरामपुर-रामानुजगंज कराने के लिए शीर्ष अधिकारियों को लाखों रुपए दिए गए थे। 

जून 2026 को आदेश भी निकल गया, लेकिन हाईकोर्ट के आदेश के बाद ट्रांसफर निरस्त हो गया। चिट्ठी में बड़ी धमकी दी गई कि ट्रांसफर रुकने के कारण लाखों रुपए डूब गए हैं, अतः दुबे का ट्रांसफर कहीं और किया जाए, वरना कोई भी 'एक्सट्रीम' कदम उठाया जाएगा।

पिक्चर अभी बाकी थी। जब इस वायरल लेटर की भनक बिलासपुर में पदस्थ नवनीत तिवारी को लगी, तो उनके पैरों तले जमीन हिल गई। उन्होंने तुरंत बिलासपुर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक से मामले की लिखित शिकायत की। शिकायत में उन्होंने स्पष्ट किया कि उनके द्वारा ऐसा कोई पत्र नहीं भेजा गया है। मतलब यह है कि किसी ने तिवारी को मोहरा बनाकर दुबे को बचाने और वरिष्ठ अधिकारियों पर दबाव बनाने का तगड़ा जाल बुना है। इस पूरे फर्जीवाड़े को लेकर आबकारी अधिकारी ने पुलिस अधीक्षक को एफआईआर दर्ज करने के लिए पत्र लिखा है।

 

अब बात उस मोहरे की, जिसके चारों तरफ यह पूरा ताना-बाना बुना गया है—दिनेश दुबे। यह कोई आम बाबू नहीं है। इसके रसूख के आगे सिस्टम कैसे घुटने टेकता है, इसका ट्रेलर पहले ही रिलीज हो चुका है। कुदुदंड में आलीशान कोठी, गंगानगर में दो मंजिला मकान, व्यापार विहार में प्रॉपर्टी और मस्तूरी के पाराघाट में फार्म हाउस—ये सब बाबू की सरकारी सैलरी से कैसे बन गए?

मिर्जा शौकत बेग वाली पुरानी शिकायत याद कीजिए। एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) ने छापा मारा था। भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत एफआईआर भी दर्ज हुई। लेकिन फिर रातों-रात ऐसा जादू हुआ कि बिना संपत्तियों की पूरी गिनती किए ही कोर्ट में खात्मा (क्लोजर) रिपोर्ट पेश कर दी गई। सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देकर कानूनी लड़ाई लड़ने वाला शिकायतकर्ता भी अचानक पीछे हट गया। परदे के पीछे क्या 'डील' हुई, यह आज भी राज है।

इस लिपिक का शातिर दिमाग नोटबंदी के वक्त भी दिखा था। अपनी काली कमाई सफेद करने के लिए इसने ऑफिस के चपरासियों—जीआर महार, हीरालाल, संतोष और नरेश के बैंक खातों को निजी एटीएम की तरह इस्तेमाल किया। लाखों की नकदी इधर से उधर घुमाई गई। पत्नी मीनाक्षी और बेटे आदित्य के खातों में भी माल डंप किया गया। अगस्त 2017 में पीएमओ तक शिकायत पहुंची, लेकिन दुबे का बाल भी बांका नहीं हुआ।

 

इनसाइड स्टोरी: वो राज जो फाइलों में दफ्न हैं

  •   लेटर बम किसने फोड़ा? अगर प्रभारी अधिकारी ने यह चिट्ठी नहीं लिखी, तो क्या बाबू ने खुद को चर्चा में लाने और ट्रांसफर रुकवाने के लिए यह चाल चली?
  •  एसीबी की मेहरबानी क्यों? करोड़ों की नामी-बेनामी संपत्ति होने के बावजूद जांच एजेंसी ने बिना गिनती किए केस कैसे रफा-दफा कर दिया?
  •  गॉडफादर कौन? हर बार बड़े मामलों से बेदाग निकल जाने वाले इस बाबू के सिर पर आखिर किस सफेदपोश का हाथ है?