नई दिल्ली: वैश्विक तनाव के बीच टेक्नोलॉजी अब सुरक्षा के लिए नई चुनौती बनती दिख रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, चीनी कंपनियां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ओपन-सोर्स डेटा का इस्तेमाल कर अमेरिकी सैन्य ठिकानों और गतिविधियों की निगरानी करने वाले टूल विकसित कर रही हैं। इस दावे ने अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों के बीच चिंता बढ़ा दी है।

बताया जा रहा है कि ये कंपनियां सैटेलाइट इमेजरी, फ्लाइट ट्रैकिंग सिस्टम और समुद्री जहाजों के डेटा को AI के जरिए प्रोसेस कर संवेदनशील जानकारियों का विश्लेषण कर रही हैं। इन तकनीकों के माध्यम से सैन्य जहाजों, विमान गतिविधियों और रणनीतिक ठिकानों की लोकेशन से जुड़ी जानकारी सामने लाने का दावा किया जा रहा है, जिससे भविष्य के युद्ध परिदृश्य को लेकर नए सवाल खड़े हो गए हैं।

विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल तकनीकी नवाचार नहीं, बल्कि एक व्यापक रणनीति का हिस्सा हो सकता है, जिसमें निजी कंपनियों की क्षमताओं को रक्षा क्षेत्र के साथ जोड़ा जा रहा है। हालांकि आधिकारिक तौर पर इन गतिविधियों से दूरी बनाई जा रही है, लेकिन कई रिपोर्ट्स इन कंपनियों के सैन्य ढांचे से संभावित संबंधों की ओर इशारा करती हैं।

इस मुद्दे पर अमेरिकी अधिकारियों के बीच भी मतभेद देखने को मिल रहे हैं। कुछ इसे बढ़ते खतरे के रूप में देख रहे हैं, जबकि अन्य का मानना है कि फिलहाल इन टूल्स का वास्तविक प्रभाव सीमित हो सकता है। फिर भी विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि यह तकनीक और विकसित हुई, तो भविष्य में सैन्य गोपनीयता बनाए रखना और कठिन हो सकता है, जिससे वैश्विक सुरक्षा संतुलन प्रभावित हो सकता है।