रायपुर / बिलासपुर। सरकार का नारा है- भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस। लेकिन मंत्रालय की बंद कमरों और फाइलों के बीच यह नारा कैसे दम तोड़ देता है, इसका जीता-जागता उदाहरण जल संसाधन विभाग का बहुचर्चित अरपा भैंसाझार भूमि अधिग्रहण घोटाला है। यहां एक ही एफआईआर दर्ज है। आरोप भी एक जैसे हैं। लेकिन आरोपियों के लिए सजा और इनाम के नियम चेहरे देखकर तय किए जा रहे हैं।

राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) ने इस घोटाले में एफआईआर (07/2025) दर्ज की है। मामले में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17(क) के तहत जल संसाधन विभाग के 21 इंजीनियरों के खिलाफ जांच की मंजूरी भी बकायदा दे दी गई है। कायदे से इन दागी अफसरों पर गाज गिरनी चाहिए थी, लेकिन विभाग ने अपने एक चहेते अफसर को न सिर्फ प्रमोशन का तोहफा दिया, बल्कि उसे ‘बेस्ट एक्सीलेंट इंजीनियर’ का अवार्ड भी थमा दिया। यह पूरा खेल विभागीय सचिव राजेश सुकुमार टोप्पो और उनके मातहतों की नाक के नीचे, बल्कि उनके हस्ताक्षरों से खेला गया है।

एक एफआईआर, चार अफसरों के साथ अलग-अलग बर्ताव

जल संसाधन विभाग ने 17 दिसंबर 2025 को एक पत्र (फाइल क्रमांक ESTB-1024(2)/946/2025-WRD) ईओडब्ल्यू रायपुर को भेजा। इसमें अरपा भैंसाझार परियोजना के 21 इंजीनियरों पर जांच की अनुमति दी गई। इस सूची में उप अभियंता से लेकर कार्यपालन अभियंता तक शामिल हैं। सूची में चार नाम प्रमुख हैं, जिनके साथ विभाग ने चार अलग-अलग तरह का बर्ताव किया है। फाइलों का यह खेल किसी भी प्रशासनिक समझ से परे है:

1. एसएल द्विवेदी (तत्कालीन एई): सूची में 13वें नंबर पर दर्ज द्विवेदी पर जांच बैठी। उन्हें सस्पेंड किया गया। जब कार्यपालन अभियंता से अधीक्षण अभियंता पद पर प्रमोशन की बारी आई, तो उनके मामले को नियम के तहत "सीलबंद लिफाफे" (लिफाफा बंद) में डाल दिया गया।

2. आईए सिद्दीकी (तत्कालीन एई): सूची में 20वें नंबर पर इनका भी नाम है। उसी एफआईआर में सह-आरोपी हैं। लेकिन सिस्टम की मेहरबानी देखिए, इन्हें कार्यपालन अभियंता से अधीक्षण अभियंता बना दिया गया। बात यहीं नहीं रुकी, हाईकोर्ट का स्टे होने के बावजूद इन्हें प्रभारी मुख्य अभियंता की कुर्सी पर बैठा दिया गया। हद तो तब हो गई जब 15 सितंबर 2026 को इंजीनियर डे के मौके पर इन्हें ‘बेस्ट एक्सीलेंट इंजीनियर’ का अवार्ड भी पकड़ा दिया गया।

3. डी. निखरा (तत्कालीन एई): सूची में 17वें नंबर पर दर्ज निखरा 30 अप्रैल 2026 को रिटायर हो गए। एफआईआर में नाम होने के बावजूद उन्हें रातों-रात बिना किसी जांच-पड़ताल के एनओसी (NOC) सर्टिफिकेट थमा दिया गया।

4. डी. जायसवाल (तत्कालीन ईई): सूची के 21वें नंबर के आरोपी। ये 31 जुलाई 2026 को रिटायर हुए। लेकिन विभाग ने यहां नियम का हवाला देते हुए जांच पेंडिंग बताई और आज तक एनओसी रोक कर रखी है।

एक ही मामला, एक ही चार्जशीट, लेकिन किसी को लिफाफा बंद, किसी को अवार्ड, किसी को एनओसी और किसी को जांच का डंडा। यह सीधे तौर पर मनमानी है, जहां समानता के अधिकार (आर्टिकल 14) को रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया है।

प्रमोशन आखिर मिला कैसे? नियम क्या कहते हैं

यह कोई राय का मुद्दा नहीं है, बल्कि सरकारी नियम-कायदों को ताक पर रखने का मामला है। केंद्र सरकार के डीओपीटी (DoPT) के 1992 और 2012 के नियम साफ कहते हैं कि अगर किसी अफसर पर सस्पेंशन हो, विभागीय चार्जशीट जारी हो चुकी हो या फिर आपराधिक मामला लंबित हो, तो प्रमोशन के वक्त उसका नाम सीलबंद लिफाफे में रखा जाता है। जब तक वह पूरी तरह बेदाग साबित न हो जाए, उसे प्रमोट नहीं किया जा सकता।

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17(क) के तहत जब सरकार खुद जांच की मंजूरी दे रही है, तो इसका सीधा मतलब है कि सरकार मानती है कि पहली नजर में (प्रथम दृष्टया) अफसर के खिलाफ सबूत हैं। ऐसे में एसएल द्विवेदी का लिफाफा तो बंद कर दिया गया, जो कि सही था। लेकिन उसी बैठक में, उन्हीं आरोपों से घिरे आईए सिद्दीकी का लिफाफा बंद क्यों नहीं किया गया?

डीपीसी की बैठक और फाइलों में छिपाए गए तथ्य

इस पूरे खेल में सबसे बड़ी भूमिका विभागीय सचिव राजेश सुकुमार टोप्पो की नजर आ रही है। ईओडब्ल्यू को जांच की मंजूरी देने वाले पत्र पर उप सचिव रविन्द्र कुमार मेढ़ेकर के दस्तखत हैं और इसे सचिव टोप्पो का अनुमोदन प्राप्त है। यानी सचिव को पता था कि सिद्दीकी ईओडब्ल्यू की जांच के दायरे में हैं।

लेकिन जब सिद्दीकी के प्रमोशन के लिए डीपीसी (विभागीय पदोन्नति समिति) की बैठक हुई, तो उसके कार्यवाही विवरण में ईओडब्ल्यू की एफआईआर और धारा 17(क) की जांच का कोई जिक्र ही नहीं किया गया। फाइल से यह तथ्य जानबूझकर गायब कर दिया गया। सचिव टोप्पो ने भी इस कार्यवाही विवरण पर अपने हस्ताक्षर कर दिए। एक अफसर के खिलाफ आपराधिक जांच के इतने बड़े तथ्य को डीपीसी से छिपाना विभागीय अनुशासन और सिविल सेवा आचरण नियमों की धज्जियां उड़ाना है।

शिकायत करने पर मिली धमकी- "मैं सचिव का करीबी हूं, नौकरी खा जाऊंगा"

जब एक ही मामले में द्विवेदी को किनारे कर दिया गया और सिद्दीकी मलाईदार पोस्टिंग पा गए, तो द्विवेदी ने इसकी लिखित शिकायत की। मामला जब प्रमुख अभियंता कार्यालय पहुंचा और वहां से स्पष्टीकरण मांगा गया, तो अफसरों के बीच हड़कंप मच गया।

विभागीय सूत्रों के मुताबिक, शिकायत की भनक लगते ही सिद्दीकी ने द्विवेदी को सीधे तौर पर धमकाना शुरू कर दिया। बताया जाता है कि सिद्दीकी ने द्विवेदी से कहा- "अगर इस तरह की शिकायत करोगे, तो मैं तुम्हारी नौकरी खा जाऊंगा। तत्काल शिकायत वापस लो। मैं अभी मुख्य अभियंता (प्रबोधन) की कुर्सी पर हूं, जहां से सारा काम होता है। मैं सचिव का बहुत करीबी हूं, सचिव मेरे इशारे पर चलते हैं। शिकायत वापस लो, नहीं तो सचिव को बोलकर तुम्हें बर्खास्त करवा दूंगा।"

दबाव और खौफ का आलम यह रहा कि द्विवेदी को अपनी शिकायत वापस लेनी पड़ी। एक दागी अफसर अपने से छोटे अफसर को सचिव के नाम पर खुलेआम धमका रहा है। यह मामला सिर्फ प्रमोशन में गड़बड़ी का नहीं रह गया है, बल्कि पद के दुरुपयोग, ब्लैकमेलिंग और व्हिसल ब्लोअर को डराने का बन चुका है। यह भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 और 13 के दायरे में आता है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सच में विभाग किसी "इशारे" पर चल रहा है?

"घोटाला कीजिए और अवार्ड ले जाइए"

इस पूरे मामले का सबसे बड़ी और हास्यास्पद बात यह है कि जिस अफसर पर ईओडब्ल्यू जांच के लिए सरकार खुद फाइलें आगे बढ़ा रही है, उसी अफसर को विभाग ने 15 सितंबर 2026 को "बेस्ट एक्सीलेंट इंजीनियर" के सम्मान से नवाज दिया। आम जनता और ईमानदार अफसरों के बीच इसका संदेश बड़ा कड़वा गया है- "आइए, घोटाला कीजिए, फाइलों का जुगाड़ जमाइए और बेस्ट इंजीनियर का अवार्ड ले जाइए।" क्या सरकार का सुशासन और जीरो टॉलरेंस का यही असली चेहरा है?

क्या अब होगी कार्रवाई?

मंत्रालय के गलियों में अब इस बात की चर्चा जोरों पर है कि क्या मुख्यमंत्री और विभागीय मंत्री विष्णु देव साय इस खुली धांधली पर कोई एक्शन लेंगे? इस मामले में कई कदम उठाए जाने बाकी हैं:

  • आईए सिद्दीकी का प्रमोशन तत्काल प्रभाव से रोककर सीलबंद लिफाफे का नियम लागू किया जाना चाहिए।
  • हाईकोर्ट के स्टे के बावजूद उन्हें प्रभारी मुख्य अभियंता की कुर्सी पर क्यों बैठाया गया, इसकी जांच हो और उन्हें तत्काल प्रभाव से पद से हटाया जाए।
  • रिटायर हो चुके निखरा को दी गई एनओसी वापस ली जाए और सभी आरोपियों पर एक समान नियम लागू हो।
  • डीपीसी की बैठक में ईओडब्ल्यू जांच का तथ्य छिपाने के मामले में सचिव टोप्पो और उप सचिव मेढ़ेकर की भूमिका की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।
  • शिकायतकर्ता अफसर को धमकाने के मामले में अलग से केस दर्ज कर उसे सुरक्षा मुहैया कराई जाए।
  • सबसे पहले, उस "बेस्ट एक्सीलेंट इंजीनियर" अवार्ड को वापस लिया जाए, जिसने पूरे सिस्टम का मजाक बनाकर रख दिया है।