बिलासपुर। बिलासपुर के सीपत में संचालित एशिया की सबसे बड़ी NTPC परियोजना भू विस्थापित को रोजगार उपलब्ध कराने के मामले को लेकर विवादों में है। यहां अपनी जमीन गंवाने वाले भू-विस्थापित सालों से रोजगार के लिए भटक रहे हैं। एक ऐसी शिकायत सामने आई है, जिसने जिला प्रशासन और NTPC प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला 2008 में तैयार की गई रोजगार वरीयता सूची में हुई गड़बड़ी का है जिसकी शिकायत अब मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुंची है।

भू-विस्थापित भगत सिंह राठौर ने बताया कि उनके साथ NTPC प्रबन्धन ने रोजगार देने के नाम पर बड़ा खेल किया गया है। नियमानुसार जिन किसानों की एक एकड़ से अधिक भूमि अधिग्रहित हुई है, उन्हें तीन साल के भीतर नौकरी देने की योजना थी। लेकिन इसके उलट जमीनी हकीकत कुछ और है शिकायतकर्ता का दावा है कि ऐसे कई अपात्र लोग जिनकी एक एकड़ से कम जमीन एनटीपीसी प्रबंधन ने अधिग्रहित की थी, उन्हें कागजों में ज्यादा जमीन वाला दर्शाकर नौकरी बांट दी गई। वहीं जो असली हकदार थे, वे आज भी दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं।

 

इस पूरे प्रकरण में तत्कालीन एसडीएम और मौजूदा बिलासपुर कलेक्टर संजय अग्रवाल के कार्यकाल पर सवाल उठाए गए हैं। शिकायत के मुताबिक, उनके समय में ही यह वरीयता सूची बनी थी, जिसमें भारी अनियमितताएं हुई है। राठौर ने मुख्यमंत्री हेल्पलाइन 1076 में दर्ज अपनी शिकायत में यह मांग भी रखी है कि इस मामले की जांच मस्तूरी एसडीएम शिवराम कंवर को न सौंपी जाए। शिकायतकर्ता का कहना है कि मस्तूरी एसडीएम न तो उनकी पूरी बात सुनते हैं, न ही रिकॉर्ड का ठीक से अवलोकन करते हैं और कार्रवाई के नाम पर हाथ खड़े कर देते हैं।

प्रशासनिक सुस्ती का आलम यह है कि ऊर्जा विभाग भी इस मामले में आदेश दे चुका है। मानवाधिकार संगठन की पहल पर मंत्रालय से वरीयता सूची की जांच और त्रिपक्षीय बैठक कराने के निर्देश जारी हुए थे। एक साल का लंबा वक्त बीत जाने के बाद भी फाइलें ठंडे बस्ते में पड़ी हैं और किसी भी स्तर पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।

अपने हक की लड़ाई लड़ते हुए भगत सिंह राठौर को छह से सात साल बीत चुके हैं। हर विभागीय चौखट पर दस्तक देने के बाद अब उन्होंने न्याय की उम्मीद में CM हेल्पलाइन का दरवाजा खटखटाया है। उनकी मांग है कि दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो, निष्पक्ष जांच कराई जाए और पात्र भू-विस्थापितों रोजगार मिले। अब देखना यह है कि प्रशासन के आला अधिकारियों पर लगे इन आरोपों के बाद शासन स्तर पर इस फाइल को कितनी गंभीरता से लिया जाता है।