
रायपुर। सरकारी दफ्तरों की धूल फांकती फाइलों में घोटाले कैसे दबते हैं और चहेतों को कैसे उपकृत किया जाता है, इसका नया मामला सामने आया है। छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (सीजीपीएससी) घोटाले में जेल की हवा खा रहे टामन सिंह सोनवानी के कार्यकाल का और बड़ा फर्जीवाड़ा उजागर हुआ है। आरोप है कि विभागीय जांच और आयोग के सदस्य की दंडात्मक सिफारिशों को पूरी तरह दरकिनार करते हुए आदिम जाति विकास विभाग के अपात्र अधिकारी को प्रमोशन का लाभ दे दिया गया।
आरटीआई कार्यकर्ता आशीष देव सोनी ने सूचना के अधिकार के तहत जो दस्तावेज निकाले हैं, उनसे इस पूरे खेल की पोल खुल गई है। मामले की लिखित शिकायत अब सीबीआई, ईओडब्ल्यू, मुख्य सचिव विकासशील और सामान्य प्रशासन विभाग (जीएडी) तक पहुंच गई है। शिकायत में मांग की गई है कि दोषियों पर कड़ी कार्रवाई हो और घोटाले की पूरी रकम की रिकवरी की जाए।
नियम-कानूनों को किस तरह ताक पर रखा गया, इसे समझना जरूरी है। आयोग की तय नियमावली (परिशिष्ट-01, सरल क्रमांक 3) कहती है कि अगर अध्यक्ष किसी सदस्य की राय से असहमत होते हैं, तो प्रकरण को दूसरे सदस्य के पास राय जानने के लिए भेजना अनिवार्य होता है। या फिर इसे फुल कमीशन (पूर्ण आयोग) के सामने रखकर बहुमत के आधार पर निर्णय लिया जाना चाहिए। लेकिन, तत्कालीन अध्यक्ष टामन सिंह सोनवानी ने इन सारे कायदों को किनारे लगा दिया। उन्होंने अकेले ही अपनी मनमर्जी की टिप्पणी दर्ज कर दी और दंडात्मक प्रस्ताव को पूरी तरह निरस्त कर दिया। मिलीभगत के तहत आरोपी अधिकारी को दोषमुक्त कर दिया गया और उसकी पदोन्नति की अनुशंसा भी कर डाली गई।
आरोपी अधिकारी भूपेंद्र राजपूत को बचाने की चाहत में आयोग ने भारतीय संविधान के तय क्षेत्राधिकार से बाहर जाकर अजीबोगरीब फैसला सुनाया। टामन सिंह ने उन 73 छात्रावास अधीक्षकों के वेतन से रिकवरी की सिफारिश कर दी, जिनका इस मामले से कोई वास्ता ही नहीं था। ना तो वे इस पूरी कार्रवाई में कहीं से आरोपी थे और ना ही उन्हें अपना पक्ष रखने का कोई मौका दिया गया। बिना वजह निर्दोष लोगों पर वसूली का आदेश थोप दिया गया।
पूरा मामला आदिम जाति विकास विभाग के तत्कालीन सहायक आयुक्त भूपेंद्र कुमार राजपूत के समय का है। बात वर्ष 2020 की है, जब रायगढ़ में पदस्थापना के दौरान छात्रावासों के लिए रजिस्टर खरीदे गए थे। बाजार में जो रजिस्टर 50 रुपए में मिलता है, उसे 152 रुपए प्रति नग के भारी-भरकम दाम पर खरीदा गया। इस लेनदेन और कमीशनखोरी की शिकायत के बाद विभागीय जांच बैठाई गई थी। जांच में वित्तीय अनियमितता पूरी तरह साबित भी हो गई थी। इसी आधार पर भूपेंद्र के खिलाफ 148920 रुपए की वसूली का प्रस्ताव और अभिमत दर्ज किया गया था।
टामन सिंह की इसी अवैध अनुशंसा के दम पर दागी अधिकारी भूपेंद्र कुमार राजपूत को प्रमोट कर अतिरिक्त संचालक बना दिया गया। फिलहाल वे मंत्रालय में संयुक्त सचिव की कुर्सी पर बैठे हैं। इस पूरे फर्जीवाड़े के आधिकारिक खुलासे के बाद आरटीआई कार्यकर्ता ने 17 जून 2020 को जारी अवैध परामर्श पत्र को तुरंत रद्द करने की मांग उठाई है। साथ ही नामांकित सदस्य के असहमति वाले अभिमत के आधार पर प्रकरण का रिव्यू करने की बात कही है।
मामले को लेकर आदिम जाति एवं अनुसूचित जनजाति विकास विभाग के सचिव भुवनेश यादव का बयान भी सामने आया है। उनका कहना है कि यह प्रकरण उनके आने के पहले का है। ऐसे में दस्तावेजों को देखने के बाद ही वे कुछ कह पाएंगे। उनका कहना है कि इस तरह की कोई गड़बड़ी हुई है, तो मामले की पूरी जानकारी लेने के बाद ही वस्तुस्थिति स्पष्ट होगी।