रायपुर। देश की राजनीति में मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधित्व और राजनीतिक-प्रशासनिक भागीदारी को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के शासनकाल में अल्पसंख्यकों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिलने के विपक्षी आरोपों के बीच भाजपा संगठन में मुस्लिम नेताओं की मौजूदगी और प्रशासनिक सेवाओं में मुस्लिम अधिकारियों की महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां चर्चा का विषय बनी हुई हैं। छत्तीसगढ़ में भी कई मुस्लिम अधिकारी प्रशासनिक, तकनीकी और पुलिस विभागों में अहम पदों पर सेवाएं दे रहे हैं।

भाजपा की ओर से 'सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास' के सिद्धांत को अपनी नीतियों का आधार बताया जाता है। वहीं, विपक्षी दल मुस्लिम समुदाय की राजनीतिक भागीदारी, सांसदों और मंत्रियों की संख्या को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। ऐसे में संगठनात्मक और प्रशासनिक स्तर पर मुस्लिम अधिकारियों एवं नेताओं की भूमिका को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।

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भाजपा संगठन में मुस्लिम नेताओं को मिली अहम जिम्मेदारी

भाजपा के राष्ट्रीय संगठन में मुस्लिम समुदाय के कुछ प्रमुख चेहरों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी गई हैं। इनमें अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) के पूर्व कुलपति प्रोफेसर तारिक मंसूर का नाम प्रमुख है। उन्हें भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के रूप में जिम्मेदारी दी गई है। शिक्षा और सामाजिक क्षेत्र में उनके अनुभव को पार्टी संगठन के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

इसी तरह उत्तर प्रदेश के मेरठ से जुड़े कुंवर बासित अली को भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया है। उनकी जिम्मेदारी अल्पसंख्यक समुदाय के बीच संगठन की पहुंच बढ़ाने और पार्टी की नीतियों को समाज तक पहुंचाने की है।

छत्तीसगढ़ में महत्वपूर्ण पदों पर मुस्लिम IAS अधिकारी

छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक तंत्र में भी मुस्लिम समुदाय के कई अधिकारी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभा रहे हैं। इनमें शम्मी आबिदी, मोहम्मद कैसर अब्दुलहक, इफ्फत आरा और शहला निगार जैसे अधिकारियों के नाम शामिल हैं।

शम्मी आबिदी प्रशासनिक स्तर पर महिला एवं बाल विकास विभाग सहित महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुकी हैं। मोहम्मद कैसर अब्दुलहक लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग में सचिव स्तर पर सेवाएं दे चुके हैं। वहीं, इफ्फत आरा राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग में विशेष सचिव के रूप में कार्यरत बताई गई हैं।

शहला निगार कृषि उत्पादन आयुक्त और कृषि विकास एवं किसान कल्याण विभाग की सचिव जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों से जुड़ी रही हैं। इसके अलावा डॉ. फरीहा आलम, रेना जमील और उम्मेजा खातून अंसारी जैसे नाम भी प्रशासनिक सेवाओं में मुस्लिम अधिकारियों की भागीदारी के उदाहरण के रूप में सामने आते हैं।

पुलिस और तकनीकी विभागों में भी निभा रहे जिम्मेदारी

पुलिस विभाग में भी मुस्लिम अधिकारियों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। छत्तीसगढ़ कैडर के आईपीएस अधिकारी आरिफ एच. शेख प्रदेश के विभिन्न जिलों में पुलिस अधीक्षक के रूप में सेवाएं दे चुके हैं। इनमें रायपुर, बिलासपुर, बस्तर और बलौदाबाजार जैसे जिले शामिल हैं।

इसके अलावा आईए सिद्दीकी ने छत्तीसगढ़ जल संसाधन विभाग में तकनीकी जिम्मेदारियां निभाई हैं। उन्होंने रायपुर संभाग में सुपरिंटेंडिंग इंजीनियर और बिलासपुर के कोटा क्षेत्र में सब-डिविजनल ऑफिसर के रूप में भी काम किया है। प्रदेश के विभिन्न जिलों में थाना प्रभारी, तहसीलदार और डिप्टी कलेक्टर जैसे पदों पर भी मुस्लिम अधिकारी अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

योग्यता और प्रतिनिधित्व को लेकर राजनीतिक बहस

प्रशासनिक सेवाओं में अधिकारियों का चयन यूपीएससी और राज्य लोक सेवा आयोग जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं के माध्यम से निर्धारित नियमों के तहत होता है। अधिकारियों की पदस्थापना और विभागीय जिम्मेदारियां शासन के प्रशासनिक निर्णयों से तय होती हैं। इसलिए प्रशासनिक पदों पर मौजूदगी को सीधे किसी राजनीतिक दल की नियुक्ति या उपलब्धि के रूप में देखना उचित नहीं होगा।

वहीं, राजनीतिक संगठनों में प्रतिनिधित्व का आकलन संगठनात्मक पदों, चुनावी भागीदारी और नीतिगत निर्णयों में सहभागिता के आधार पर किया जा सकता है।

कुल मिलाकर मुस्लिम प्रतिनिधित्व का मुद्दा केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं है। संगठन, प्रशासन और जनसेवा के विभिन्न क्षेत्रों में समुदाय की भागीदारी भी इस बहस का महत्वपूर्ण पहलू है। अब सवाल यह है कि आने वाले समय में राजनीतिक दल अल्पसंख्यक समुदाय को प्रतिनिधित्व देने के साथ उनकी सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक भागीदारी बढ़ाने के लिए क्या कदम उठाते हैं।