बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण (Abetment of Suicide) से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति से उधार दी गई राशि वापस मांगना, बार-बार संपर्क करना या कानूनी कार्रवाई की चेतावनी देना अपने आप में आत्महत्या के लिए उकसाने की श्रेणी में नहीं आता। इसी आधार पर कोर्ट ने 12 साल पुराने मामले में दोषी ठहराए गए आरोपी की सात साल की सजा रद्द करते हुए उसे बरी कर दिया है।

सरपंच की आत्महत्या के बाद दर्ज हुआ था मामला
मामला धमतरी जिले के बलियारा गांव का है। जून 2014 में तत्कालीन सरपंच बलराम मंडावी का शव उनके खेत में मिला था। जांच के दौरान यह सामने आया कि उन्होंने कथित रूप से कीटनाशक का सेवन कर आत्महत्या की थी। घटनास्थल से बरामद सुसाइड नोट में एक ठेकेदार का नाम होने के बाद पुलिस ने मामला दर्ज किया था। आरोप था कि चौपाल निर्माण कार्य के लिए सामान के भुगतान को लेकर ठेकेदार लगातार रकम की मांग कर रहा था और इसी दबाव के चलते सरपंच ने आत्मघाती कदम उठाया था।

हाईकोर्ट ने साक्ष्यों का किया परीक्षण
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध दस्तावेजों, गवाहों के बयान और पूर्व न्यायिक फैसलों का परीक्षण किया। अदालत ने पाया कि आरोपी की ओर से ऐसी कोई प्रत्यक्ष कार्रवाई या व्यवहार साबित नहीं हुआ, जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि उसने मृतक को आत्महत्या करने के लिए उकसाया था। कोर्ट ने कहा कि केवल बकाया राशि की मांग करना या भुगतान के लिए दबाव बनाना आईपीसी की धारा 306 के तहत दुष्प्रेरण साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं माना जा सकता, जब तक आत्महत्या के लिए स्पष्ट उकसावे के ठोस प्रमाण मौजूद न हों।

ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी सात साल की सजा
इस मामले में धमतरी की विशेष अदालत ने पहले आरोपी को एससी-एसटी एक्ट के आरोपों से मुक्त कर दिया था, लेकिन आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण का दोषी मानते हुए सात वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी। ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। दूसरी ओर मृतक के परिजनों ने भी सजा बढ़ाने और अन्य धाराओं के तहत कार्रवाई की मांग करते हुए याचिका दाखिल की थी।

हाईकोर्ट ने आरोपी को दी राहत
एकलपीठ ने सुनवाई के बाद कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपी के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप साबित नहीं होता। अदालत ने ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई सजा को निरस्त करते हुए आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया। यह फैसला आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण से जुड़े मामलों में कानूनी मानकों और साक्ष्यों की आवश्यकता को लेकर एक महत्वपूर्ण न्यायिक टिप्पणी माना जा रहा है।