
रायपुर। कहते हैं सरकारी विभागों में फाइलें पहियों पर चलती हैं, लेकिन जब मामला करोड़ों के भ्रष्टाचार का हो और उसमें रसूखदार अफसर फंस रहे हों, तो उन फाइलों के पहियों में अचानक जंग लग जाता है। हरदीडीह एनीकट घोटाले की कहानी भी इसी जंग लगी व्यवस्था का उदाहरण बन रही है। जल संसाधन विभाग में एक तरफ तो विधानसभा की गूंज के बाद ताबड़तोड़ जांच के आदेश निकलते हैं, वहीं दूसरी तरफ जांच करने वाली समिति को रिकॉर्ड रूम का रास्ता ही नहीं दिखाया जा रहा।
हाल ही में विधानसभा में हरदीडीह एनीकट निर्माण में हुई भारी गड़बड़ियों का मुद्दा गरमाया था। इसके बाद विभाग ने 14 जुलाई 2026 को तीन सदस्यों वाली एक उच्च स्तरीय जांच समिति गठित कर दी। समिति को निर्देश मिला कि दो सप्ताह के भीतर अपना जांच प्रतिवेदन सौंप दें। समय बीतता गया और 27 जुलाई 2026 को गोदावरी कछार, जगदलपुर के मुख्य अभियंता कार्यालय को एक पत्र जारी करना पड़ा। इस पत्र में बताया गया कि जांच समिति द्वारा मांगे गए जरूरी अभिलेख अब तक उपलब्ध नहीं कराए गए हैं। दस्तावेजों के अभाव में जांच प्रक्रिया को आगे बढ़ाना मुमकिन नहीं हो पा रहा है। पत्र में संबंधित अधिकारियों से जल्द से जल्द रिकॉर्ड देने का आग्रह किया गया है। यानी जिस समिति को करोड़ों के भ्रष्टाचार की क्षति का आकलन कर जिम्मेदारियां तय करनी थीं, उसे मूल रिकॉर्ड ही नहीं सौंपे जा रहे।
अब सवाल उठता है कि ये दस्तावेज छिपाकर आखिर किसे बचाने की कोशिश हो रही है? दरअसल, हरदीडीह एनीकट का निर्माण तत्कालीन मुख्य अभियंता संजय भागवत और तत्कालीन कार्यपालन अभियंता सुरेश पांडेय के कार्यकाल के दौरान हुआ था। अगर उस समय के तकनीकी अभिलेख, स्वीकृतियां, गुणवत्ता परीक्षण और भुगतान से जुड़े रिकॉर्ड जांच समिति की टेबल पर आ गए, तो पुराने निर्णयों की परतें खुल जाएंगी। यही कारण है कि आवश्यक दस्तावेज रोककर विधानसभा की कार्यवाही की अनदेखी की जा रही है और जांच को भटकाने का प्रयास हो रहा है।
इसमें एक और पेंच संविदा नियुक्ति का है। तत्कालीन मुख्य अभियंता संजय भागवत सेवानिवृत्त होने के बाद भी पिछले 10 वर्षों से संविदा पर विभाग में मुख्य अभियंता के रूप में काम कर रहे हैं। अब उन्होंने फिर से संविदा विस्तार के लिए नया आवेदन लगा दिया है। सवाल यह है कि जिस अधिकारी के ऊपर करोड़ो के भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हों, उसे विभाग 10 सालों से क्यों ढो रहा है? भाजपा ने अपने चुनाव घोषणा-पत्र में संविदा नियुक्तियां खत्म करने का वादा किया था, लेकिन यहां तो स्थिति उलट है। क्या पूरे जल संसाधन विभाग में यही एक योग्य अधिकारी बचे हैं जो रिटायर होने के बाद भी कुर्सी नहीं छोड़ पा रहे? दूसरी ओर, तत्कालीन कार्यपालन अभियंता सुरेश पांडेय भी प्रमोशन पाकर आज बिलासपुर में मुख्य अभियंता के पद पर विराजमान हैं।
जब विभाग ने स्वयं यह समिति बनाई है, तो उसे दस्तावेज देने से कौन रोक रहा है? इसका कारण उच्च पदों पर बैठे इन अधिकारियों का रसूख बताया जा रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि पद के प्रभाव से अधिकारियों को डराने और प्रलोभन देने का खेल चल रहा है, ताकि पूरा मामला ठंडे बस्ते में चला जाए। यदि इनके पूरे कार्यकाल की निष्पक्ष जांच हो जाए तो सुशासन के दावों की जमीन खिसक जाएगी।