
रायपुर। छत्तीसगढ़ के प्रतिष्ठित इंदिरा कृषि विश्वविद्यालय (IGKV) में नियमों की धज्जियां उड़ाकर चहेतों की जेबें भरने का एक बेहद सनसनीखेज मामला निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। यूजीसी (UGC) और शासन के सख्त नियमों को ताक पर रखकर, बिना 'नेट' (NET) परीक्षा पास किए 57 अपात्रों को पूरे 14 साल तक प्रोफेसर का मोटा वेतन और एरियर बांटा जाता रहा। सरकारी खजाने में सेंधमारी के इस बड़े मामले की जांच रिपोर्ट अब सीधे सूबे के कृषि मंत्री रामविचार नेताम की टेबल पर पहुंच चुकी है। मंत्रालय के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि रिपोर्ट के परीक्षण के बाद इस मामले में जल्द ही बड़ी प्रशासनिक कार्रवाई हो सकती है।
ऐसे हुआ नियमों का 'चीरहरण'
नियमों के मुताबिक, किसी भी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के पद और वेतनमान के लिए राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट) पास होना एक अनिवार्य शर्त है। इसके बावजूद IGKV के कर्ताधर्ताओं ने 57 ऐसे लोगों को प्रोफेसर का दर्जा और भारी-भरकम वेतनमान दे दिया जो इसके योग्य ही नहीं थे। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह खेल एक-दो साल नहीं, बल्कि पूरे डेढ़ दशक तक बेखौफ चलता रहा। इतने सालों तक न तो किसी ऑडिट में यह पकड़ में आया और न ही वित्त विभाग ने इस पर कोई ठोस कार्रवाई की, जो विश्वविद्यालय के भीतर चल रहे एक बड़े सिंडिकेट की ओर इशारा करता है।
महीनों से फाइलों में कैद थी रिपोर्ट, अब हलचल तेज
इस पूरे मामले में ब्यूरोक्रेसी की कार्यप्रणाली भी सवालों के घेरे में थी। अपात्रों को वेतन और एरियर भुगतान की जांच इस साल फरवरी में ही पूरी हो चुकी थी। इसके बाद जांच रिपोर्ट सचिव स्तर पर महीनों से धूल फांक रही थी। लेकिन जब इस मुद्दे ने जोर पकड़ा, तो हरकत में आए अधिकारियों ने आनन-फानन में फाइल मंत्री के पास भेज दी। कृषि एवं किसान कल्याण विभाग की प्रमुख सचिव शहला निगार ने स्पष्ट किया है कि रिपोर्ट मंत्री जी को प्रेषित कर दी गई है। फिलहाल कुछ पेचीदा और तकनीकी बिंदुओं का वरिष्ठ अधिकारियों से परीक्षण कराया जा रहा है, ताकि कार्रवाई के दौरान कोई कानूनी पेंच न फंसे।
पेंशन फंड: जांच रोकने दबाई जा रही फाइलें?
अपात्रों को वेतन बांटने का मामला अभी थमा भी नहीं था कि विश्वविद्यालय के पेंशन फंड में हुए गोलमाल की परतें भी खुलने लगी हैं। शासन स्तर पर गठित जांच टीम 130 से अधिक रिटायर्ड कर्मचारियों को किए गए पेंशन भुगतान की गहराई से पड़ताल कर रही है। लेकिन सूत्रों का दावा है कि विश्वविद्यालय प्रबंधन जांच टीम द्वारा मांगे गए अहम दस्तावेज और फाइलें जानबूझकर नहीं सौंप रहा है। रिकार्ड छिपाने की इस कोशिश से आशंका गहरा गई है कि पेंशन फंड में भी कोई बड़ा फर्जीवाड़ा छुपा हो सकता है।
कुलपति को शासन के 'डंडे' का इंतजार
विश्वविद्यालय के पास खुद की स्वायत्तता और अधिकार होने के बावजूद, प्रबंधन कोई भी सख्त कदम उठाने से बच रहा है। पूर्व में भी वित्त विभाग और ऑडिट टीमों ने कई प्रकरणों में गंभीर आपत्तियां दर्ज कराई थीं, लेकिन कार्रवाई शून्य रही। इस पूरे मामले पर जब विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. गिरीश चंदेल का पक्ष सामने आया, तो उन्होंने बड़ी ही सफाई से गेंद शासन के पाले में डाल दी। उनका कहना है कि सरकार की तरफ से जो भी निर्देश मिलेंगे, उसके अनुरूप आगे की कार्रवाई की जाएगी।