
बिलासपुर. आबकारी विभाग में पदस्थ एक बाबू का कारनामा सरकारी सिस्टम की पोल खोलने के लिए काफी है। सहायक ग्रेड 03 के पद पर बैठे दिनेश दुबे ने अपनी सरकारी नौकरी के दौरान पद का दुरुपयोग कर करोड़ों की अकूत संपत्ति खड़ी कर ली। जब इस भ्रष्टाचार की लगातार शिकायतें हुईं तो जांच बैठाई गई। उपायुक्त आबकारी संभागीय उड़नदस्ता बिलासपुर संभाग की आधिकारिक जांच रिपोर्ट में दिनेश दुबे पूरी तरह से दोषी पाया गया । रिपोर्ट में साफ है कि बाबू ने नोटबंदी के समय विभाग के चपरासियों के बैंक खातों में अपना काला धन जमा कराया। पत्नी और बच्चों के खातों में लाखों का लेन देन हुआ और कई बेशकीमती जमीनें खरीदी गईं। इसके बाद भी आबकारी विभाग इस गंभीर जांच रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डालकर बैठा है। सालों बाद भी इस भ्रष्ट बाबू पर कोई ठोस विभागीय कार्रवाई नहीं हुई।
जांच रिपोर्ट के हर पन्ने में चौंकाने वाले खुलासे
यह जानना बहुत जरूरी है कि जांच रिपोर्ट में आखिर क्या क्या बड़े खुलासे हुए। जिला आबकारी अधिकारी वेदराम लहरे ने यह विस्तृत जांच की थी। उनकी 13 जून 2018 की रिपोर्ट के मुताबिक दिनेश दुबे के खिलाफ लगे सभी आरोप प्रथम दृष्टया सौ फीसदी सही पाए गए। रिपोर्ट बताती है कि दिनेश दुबे के स्टेट बैंक आफ इंडिया सरकंडा शाखा के खाते में नोटबंदी के दौरान भारी भरकम रकम का लेन देन हुआ। 4 नवंबर 2016 से 29 दिसंबर 2017 तक इस खाते में 16 लाख 71 हजार रुपये से ज्यादा जमा किए गए। इसी खाते में 24 जनवरी 2017 को 5 लाख रुपये चेक से आए और 8 फरवरी 2017 को एक साथ 6 लाख 84 हजार रुपये नकद निकाल लिए गए।
चपरासियों को मोहरा बनाकर सफेद किया काला धन
भ्रष्टाचार का सबसे हैरान करने वाला सच नोटबंदी के दौरान सामने आया। दिनेश दुबे ने अपनी काली कमाई को सफेद करने के लिए विभाग के छोटे कर्मचारियों का जमकर इस्तेमाल किया। भृत्य गणेश राम महार के बैंक खाते में 13 नवंबर और 18 नवंबर 2016 को कुल 3 लाख 30 हजार रुपये नकद जमा कराए गए। जांच के दौरान गणेश राम ने साफ कुबूल किया कि यह पैसा दिनेश दुबे का था। इसी तरह एक अन्य भृत्य संतोष कुमार भैना के खाते में 24 नवंबर को 48 हजार 500 रुपये जमा हुए जिसमें से 40 हजार रुपये दिनेश दुबे के थे। भृत्य नरेश कुमार सोमावार के खाते में 19 नवंबर को 2 लाख रुपये जमा किए गए और उसने भी अपने बयान में माना कि यह पूरी रकम बाबू दिनेश दुबे की है। विभाग के सिर्फ एक भृत्य हीरालाल ने इस गड़बड़ी में शामिल होने और बाबू का पैसा अपने खाते में जमा करने से साफ मना कर दिया था।
परिवार के खातों में नकदी और जमीनों की खरीद
उड़नदस्ता की जांच रिपोर्ट बताती है कि बाबू ने अपने परिवार को भी इस पूरे खेल का हिस्सा बनाया। पत्नी मीनाक्षी दुबे बेटी अदिती दुबे और बेटे आदित्य दुबे के कलेक्ट्रेट शाखा वाले बैंक खातों में लगातार पांच दस और पंद्रह हजार रुपये की नकद रकम जमा की जाती रही। संपत्ति के मामले में भी बाबू ने लंबी छलांग लगाई। उप पंजीयक बिलासपुर से मिली आधिकारिक जानकारी के अनुसार पत्नी मीनाक्षी के नाम पर तखतपुर के चिचिरदा में तीन अलग अलग खसरों पर जमीनें खरीदी गईं जो साल 2013 और 2016 में ली गईं। खुद दिनेश दुबे ने साल 2016 में मंगला में 5 लाख रुपये में एक बड़ा भूखंड खरीदा और साल 2011 में कुदुदंड में 3 लाख 50 हजार रुपये का प्लाट लिया।
एसीबी की एफआईआर के बाद भी मेहरबानी जारी
इस पूरे मामले में एंटी करप्शन ब्यूरो बिलासपुर ने भी समानांतर जांच की थी। उस समय की मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक नौ साल की सरकारी नौकरी में दिनेश दुबे को वेतन के रूप में कुल करीब 20 लाख रुपये मिले लेकिन उसने 5 करोड़ से ज्यादा की बेहिसाब संपत्ति बना ली। इसके आधार पर एसीबी ने एफआईआर भी दर्ज की थी। बाबू का रसूख ऐसा था कि शराब ढुलाई का सरकारी ठेका तक लंबे समय तक दुबे ट्रांसपोर्ट के नाम पर आवंटित होता था।
सबूत पक्के हैं। गवाहों के साफ बयान दर्ज हैं और जमीनों की रजिस्ट्री के सारे दस्तावेज उड़नदस्ता टीम की रिपोर्ट के साथ संलग्न हैं। बैंक मैनेजरों ने नियमों का हवाला देकर पुराने स्टेटमेंट देने में आनाकानी जरूर की लेकिन जितने भी सुबूत जांच अधिकारी ने जुटाए वे इस बाबू को जेल भेजने के लिए काफी थे। इसके बावजूद आबकारी विभाग के आला अफसर इस पूरी रिपोर्ट को दबाकर बैठे हैं। एक दागी बाबू को बचाने के लिए पूरा सिस्टम एक साथ काम कर रहा है। भ्रष्ट बाबू पर यह सरकारी मेहरबानी बिलासपुर से लेकर रायपुर तक सत्ता के गलियारों में चर्चा में है पर किसी भी जिम्मेदार अधिकारी में इस फाइल पर निर्णय लेने की हिम्मत नहीं है और यह संगीन मामला पूरी तरह से ठंडे बस्ते के हवाले कर दिया गया है।