
बिलासपुर : जेल की सलाखों के पीछे होने का मतलब यह नहीं कि किसी कर्मचारी से अपना पक्ष रखने का अधिकार भी छीन लिया जाए। विभागीय कार्रवाई में निष्पक्ष सुनवाई के इसी सिद्धांत को अहमियत देते हुए छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने सीआरपीएफ के एक निरीक्षक की बर्खास्तगी को निरस्त कर दिया है। विभाग ने निरीक्षक को जेल में रहते हुए अपना बचाव रखने का पर्याप्त अवसर दिए बिना ही सेवा से बाहर कर दिया था। जस्टिस ए के प्रसाद की सिंगल बेंच ने विभाग की इस कार्रवाई को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत मानते हुए बर्खास्तगी और अपील खारिज करने के आदेश रद्द कर दिए। कोर्ट ने निरीक्षक वाई के सोलोमन को बिना पिछले वेतन के सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया है। हालांकि, विभाग को नियमानुसार नए सिरे से विभागीय जांच करने की छूट भी दी गई है।
प्रशिक्षण के दौरान विवाद, मारपीट के बाद हुई थी मौत
मणिपुर निवासी वाई के सोलोमन सीआरपीएफ में निरीक्षक के पद पर पदस्थ था। वर्ष 2015 में अंबिकापुर में प्रशिक्षण के दौरान 2 अगस्त को उनका संजय सिंह नामक व्यक्ति से विवाद हो गया था। विवाद के बाद मारपीट की घटना हुई और उपचार के दौरान 11 अक्टूबर 2015 को संजय सिंह की मौत हो गई। इस मामले में सोलोमन के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत आपराधिक प्रकरण दर्ज किया गया।
जेल में रहते हुए मांगा था सुनवाई का मौका, विभाग ने नहीं मानी बात
आपराधिक मामले के बीच सीआरपीएफ ने भी सोलोमन के खिलाफ विभागीय जांच शुरू कर दी। विभाग का आरोप था कि उन्होंने घटना की जानकारी छिपाई और इस आचरण से बल की छवि प्रभावित हुई। इस दौरान सोलोमन न्यायिक हिरासत में थे। उन्होंने विभाग को लिखित रूप से जानकारी देते हुए बताया कि जेल में रहते हुए अपना बचाव करना और जांच में प्रभावी ढंग से शामिल होना संभव नहीं है। उन्होंने जमानत पर रिहा होने के बाद विभागीय जांच शुरू करने का अनुरोध भी किया था। लेकिन विभाग ने उनके इस अनुरोध पर विचार नहीं किया। उनकी अनुपस्थिति में ही विभागीय जांच पूरी कर ली गई और जांच रिपोर्ट के आधार पर 3 सितंबर 2018 को उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। इस कार्रवाई के खिलाफ उनकी अपील भी 11 मई 2022 को खारिज कर दी गई।
आपराधिक मामले में बरी, फिर भी बहाली नहीं
इस बीच आपराधिक मामले में सोलोमन को राहत मिली। अंबिकापुर के तृतीय अपर सत्र न्यायाधीश ने 1 नवंबर 2021 को उन्हें संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। इसके बाद उन्होंने सेवा में बहाली के लिए विभाग के समक्ष अपील की, लेकिन 11 मई 2022 को उनकी अपील खारिज कर दी गई। आखिरकार उन्होंने विभाग के दोनों आदेशों को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
हाई कोर्ट: अपना पक्ष रखने का वास्तविक अवसर मिलना जरूरी
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि जब वह न्यायिक हिरासत में थे, तब विभाग को स्पष्ट रूप से बता दिया गया था कि जेल में रहते हुए अपना बचाव करना संभव नहीं है। इसके बावजूद विभाग ने उनकी परेशानी और जांच स्थगित करने के अनुरोध पर विचार किए बिना एकतरफा कार्रवाई कर दी। वहीं केंद्र सरकार की ओर से कहा गया कि सोलोमन ने घटना की जानकारी विभाग को नहीं दी थी, इसलिए विभागीय कार्रवाई उचित थी। यह भी दलील दी गई कि याचिकाकर्ता को वैकल्पिक अपील का रास्ता अपनाना चाहिए था।
दोनों पक्षों को सुनने के बाद जस्टिस ए के प्रसाद की सिंगल बेंच ने स्पष्ट किया कि आपराधिक मामले में संदेह का लाभ मिलने से विभागीय कार्रवाई अपने आप समाप्त नहीं हो जाती। आपराधिक मुकदमे और विभागीय जांच में साक्ष्य के मूल्यांकन तथा प्रमाण के मानक अलग-अलग होते हैं। इसलिए आपराधिक मामले में बरी होने का आधार अकेले विभागीय कार्रवाई को खत्म करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
बचाव का मौका दिए बिना गंभीर दंड देना उचित नहीं
कोर्ट ने पाया कि निरीक्षक सोलोमन ने न्यायिक हिरासत में रहते हुए विभाग को जवाब भेजा था और अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए सुनवाई टालने का अनुरोध किया था। इसके बावजूद विभाग ने उनके अनुरोध पर उचित विचार किए बिना जांच पूरी कर बर्खास्तगी का आदेश जारी कर दिया। कोर्ट ने इसे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार के विपरीत माना। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का उल्लेख करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि किसी कर्मचारी को गंभीर दंड देने से पहले उसे अपना पक्ष रखने का वास्तविक और प्रभावी अवसर दिया जाना आवश्यक है। केवल औपचारिक रूप से जांच की प्रक्रिया पूरी कर देना निष्पक्ष सुनवाई की कसौटी पर पर्याप्त नहीं है।
बर्खास्तगी और अपील के आदेश निरस्त, बहाली का रास्ता साफ
हाई कोर्ट ने 3 सितंबर 2018 के बर्खास्तगी आदेश और 11 मई 2022 के अपील आदेश को निरस्त कर दिया। साथ ही संबंधित अधिकारियों को निरीक्षक वाई के सोलोमन को सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया है। हालांकि, उन्हें पिछला वेतन (बैक वेजेस) नहीं मिलेगा। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि विभाग चाहे तो कानून के प्रावधानों के तहत उन्हें अपना पक्ष रखने का उचित अवसर देते हुए नए सिरे से विभागीय जांच कर सकता है।