छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित रामावतार जग्गी हत्याकांड में आज बहुत बड़ा फैसला आया है। बिलासपुर हाईकोर्ट ने पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के बेटे अमित जोगी को इस मामले में दोषी करार दिया है। कोर्ट ने अमित जोगी को तीन हफ्ते के भीतर पुलिस के सामने सरेंडर करने का कड़ा आदेश भी दिया है। बीस साल पुराने इस केस में हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस अरविंद वर्मा की स्पेशल डिवीजन बेंच ने यह अहम फैसला सुनाया है। इससे पहले निचली अदालत ने सबूतों के अभाव में अमित जोगी को बरी कर दिया था। अब हाईकोर्ट ने उस पुराने फैसले को पलट दिया है।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर इस पूरे मामले को हाईकोर्ट में फिर से खोला गया था। मामले की जांच करने वाली एजेंसी सीबीआई ने कोर्ट में 11 हजार पन्नों की लंबी चौड़ी रिपोर्ट पेश की थी। इसी विस्तृत जांच रिपोर्ट के आधार पर अमित जोगी पर भी चार्ज लगाए गए थे और आज अंतिम सुनवाई के बाद उन्हें दोषी माना गया है। अब उन्हें तीन हफ्ते के अंदर हर हाल में सरेंडर करना होगा जिसके बाद आगे की कानूनी प्रक्रिया पूरी की जाएगी।

बुधवार को हुई सुनवाई के दौरान डिवीजन बेंच में सतीश जग्गी सीबीआई राज्य सरकार और अमित जोगी के वकील मौजूद रहे। सुनवाई के दौरान अमित जोगी के वकील ने कोर्ट को बताया था कि उन्हें केस की फाइल उपलब्ध नहीं कराई गई है इसलिए जवाब देने के लिए उन्हें थोड़ा समय दिया जाए। हालांकि हाईकोर्ट ने समय देने से साफ इनकार कर दिया था। कोर्ट ने सीबीआई के वकील को स्पष्ट निर्देश दिया कि फाइल तुरंत उपलब्ध कराई जाए। इसके बाद कोर्ट ने अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।

जानिए कौन थे रामावतार जग्गी

रामावतार जग्गी एक कारोबारी बैकग्राउंड वाले व्यक्ति थे। वह देश के बड़े नेताओं में शुमार और पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल के बेहद करीबी माने जाते थे। जब विद्याचरण शुक्ल ने कांग्रेस छोड़कर एनसीपी ज्वाइन की तो जग्गी भी उनके साथ साथ चले गए। विद्याचरण शुक्ल ने जग्गी को छत्तीसगढ़ में एनसीपी का कोषाध्यक्ष बना दिया था।

राजनीतिक षड्यंत्र का लगा था आरोप

चार जून 2003 को रामावतार जग्गी की गोली मारकर निर्मम हत्या कर दी गई थी। इस हत्याकांड ने पूरे प्रदेश की राजनीति में भूचाल ला दिया था। पुलिस की शुरुआती जांच में पक्षपात और असंतोष के आरोप लगने लगे थे। इसके बाद राज्य सरकार ने मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी थी। तब सीबीआई ने अपनी गहन जांच में अमित जोगी समेत कई लोगों पर हत्या और साजिश रचने के गंभीर आरोप लगाए थे।

सीबीआई ने इस हत्याकांड में 31 लोगों को अभियुक्त बनाया था। इनमें से बल्टू पाठक और सुरेंद्र सिंह बाद में सरकारी गवाह बन गए थे। बाकी 29 लोगों पर अदालत में मुकदमा चला। 31 मई 2007 को रायपुर की विशेष अदालत ने अपना फैसला सुनाया। उस समय अमित जोगी को छोड़कर बाकी 28 लोगों को सजा मिली थी। अदालत ने कहा था कि अमित जोगी के खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं हैं और उन्हें बाइज्जत बरी कर दिया था।

सतीश जग्गी ने लड़ी लंबी कानूनी लड़ाई

रामअवतार जग्गी के बेटे सतीश जग्गी ने इस फैसले को मानने से इनकार कर दिया और न्याय की लड़ाई जारी रखी। उन्होंने अमित जोगी को बरी करने के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की। पहले अमित के पक्ष में स्टे लगा लेकिन बाद में सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई की अपील स्वीकार करते हुए मामले को विस्तार से सुनने के लिए फिर से छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट भेज दिया था।

हाईकोर्ट में अपील के दौरान सतीश जग्गी के अधिवक्ता बीपी शर्मा ने जोरदार तर्क पेश किए। उन्होंने कोर्ट को बताया कि यह हत्याकांड कोई साधारण अपराध नहीं था बल्कि इसकी साजिश तत्कालीन राज्य सरकार की ओर से प्रायोजित थी। वकीलों ने दलील दी कि जब सीबीआई की जांच शुरू हुई तब तक सरकार के दबाव और प्रभाव में सारे अहम सबूतों को मिटा दिया गया था। ऐसे गंभीर केस में सिर्फ सबूत अहम नहीं होते बल्कि पूरे राजनीतिक षड्यंत्र का पर्दाफाश होना जरूरी है।

इन 28 लोगों को पहले ही मिल चुकी है सजा

इस हत्याकांड में जिन 28 लोगों को दोषी पाया गया था उन्होंने भी अपनी सजा कम कराने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। लेकिन दो साल पहले हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने उनकी अपील को पूरी तरह खारिज कर दिया था। अदालत ने सभी की आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा था। सजा पाने वालों में पुलिस महकमे के दो तत्कालीन सीएसपी और एक तत्कालीन थाना प्रभारी भी शामिल थे। इनके अलावा रायपुर मेयर एजाज ढेबर के भाई याहया ढेबर और शूटर चिमन सिंह को भी उम्रकैद हुई थी।

दोषी पाए गए अन्य लोगों में अभय गोयल वीके पांडे फिरोज सिद्दीकी राकेश चंद्र त्रिवेदी अवनीश सिंह लल्लन सूर्यकांत तिवारी अमरीक सिंह गिल सुनील गुप्ता राजू भदौरिया अनिल पचौरी रविंद्र सिंह रवि सिंह लल्ला भदौरिया धर्मेंद्र सत्येंद्र सिंह शिवेंद्र सिंह परिहार विनोद सिंह राठौर संजय सिंह कुशवाहा राकेश कुमार शर्मा विक्रम शर्मा जबवंत और विश्वनाथ राजभर शामिल थे।

अब अमित जोगी के भी दोषी करार दिए जाने के बाद सीबीआई की 11 हजार पन्नों की चार्जशीट सही साबित हुई है। कोर्ट के कड़े रुख के बाद अब पुलिस और प्रशासन की नजरें अमित जोगी के सरेंडर पर टिकी हैं। कानूनी जानकारों का मानना है कि हाईकोर्ट से दोष सिद्ध होने और तीन हफ्ते में सरेंडर के आदेश के बाद अब अमित जोगी की मुश्किलें बढ़ गई हैं और उन्हें इस मामले में सजा भुगतनी ही होगी।