
रायपुर। जल संसाधन विभाग में ठेकेदारों पर नियम विरुद्ध मेहरबानी करने वाले अफसरों के मामले में 'जगत पहल' की खबर का बड़ा असर हुआ है। टेंडर की शर्तों से खिलवाड़ कर समय से पहले ठेकेदारों को करोड़ों की अतिरिक्त सुरक्षा निधि (एपीएस) लौटाने के मामले को 'जगत पहल' ने प्रमुखता से उठाया था। इसके बाद नींद से जागे मंत्रालय ने कोटा संभाग के तत्कालीन कार्यपालन अभियंता (ईई) आई.ए. सिद्दीकी पर कार्रवाई तो की, लेकिन यह कार्रवाई सजा कम और इनाम ज्यादा लग रही है।
सवाल यह है कि एक ही तरह के मामले में विभाग दो अलग-अलग अफसरों के लिए अलग-अलग कानून कैसे चला सकता है? एक तरफ जशपुर के कार्यपालन अभियंता विजय जामनिक पर एफआईआर होती है, उन्हें सस्पेंड किया जाता है, वहीं उसी तरह के मामले में आई.ए. सिद्दीकी की सिर्फ एक वेतनवृद्धि रोक कर उन्हें फाइलें क्लीयर करने का इनाम दे दिया जाता है।
विधानसभा में मुख्यमंत्री को भी अंधेरे में रखा
पिछले शीतकालीन शतर(दिसंबर 2024 और 25) में कोटा विधायक अटल श्रीवास्तव ने समय पूर्व एपीएस राशि जारी करने का मुद्दा विधानसभा में जोर-शोर से उठाया था। तब प्रदेश के साफ-सुथरी छवि वाले आदिवासी मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने सदन को बताया था कि इस मामले में विजय जामनिक के खिलाफ धारा 409 और 420 के तहत मामला दर्ज कर उन्हें निलंबित कर दिया गया है। सीएम ने यह भी आश्वासन दिया था कि सिद्दीकी, गुप्ता और मजूमदार जैसे अन्य दोषी अधिकारियों पर भी सख्त कार्रवाई की जाएगी।
लेकिन विभाग के अफसरों ने मुख्यमंत्री के इस भरोसे की ही धज्जियां उड़ा दीं। जब विधानसभा में सरकार ने खुद माना था कि सिद्दीकी पर कार्रवाई होगी, तो फिर फरवरी 2026 में सिद्दीकी को कार्यपालन अभियंता से अधीक्षण अभियंता (एसई) के पद पर प्रमोट कैसे कर दिया गया? सवाल उठता है कि वो कौन सा अफसर है जिसने सिद्दीकी की फाइल दबाई और विधानसभा को गुमराह किया।
क्या है अतिरिक्त सुरक्षा निधि (APS) का खेल?
इसे सीधे शब्दों में समझें। अगर जल संसाधन विभाग 100 रुपये का टेंडर निकालता है और कोई ठेकेदार उसे 85 रुपये में करने का ऑफर देता है, तो रेट 10 प्रतिशत से ज्यादा कम होने की वजह से ठेकेदार को 5 रुपये अतिरिक्त सुरक्षा निधि (APS) के रूप में विभाग के पास जमा करने पड़ते हैं। यह पैसा टीडीआर के रूप में कार्यपालन अभियंता के पास जमा रहता है और काम पूरा होने के बाद ही ठेकेदार को वापस किया जाता है। लेकिन विभाग के अफसरों ने ठेकेदारों को फायदा पहुंचाने के लिए काम पूरा होने से पहले ही यह करोड़ों की रकम उन्हें लौटा दी।
51 लाख की एफडीआर समय से पहले ही लौटा दी
सिद्दीकी का पूरा मामला दबेना एनीकट से संबंधित है। 4 करोड़ 13 लाख रुपये से ज्यादा का यह ठेका तय दर से 20 प्रतिशत कम पर लिया गया था। ठेकेदार ने 2 जून 2023 को 51 लाख 65 हजार 444 रुपये की एफडीआर विभाग में जमा कराई। नियम के मुताबिक यह पैसा काम पूरा होने तक लॉक रहना था। लेकिन सिद्दीकी ने ठेकेदार से साठगांठ कर अनुबंध की धज्जियां उड़ाते हुए 30 जनवरी 2024 को ही यह एफडीआर रिलीज कर दी। इतना ही नहीं, ठेकेदार को रनिंग बिल का भी भुगतान कर दिया गया।
बचाव में जूनियर के कंधे पर रखकर चलाई बंदूक
जब मामले ने तूल पकड़ा तो विभाग ने 24 मार्च 2026 को सिद्दीकी को नोटिस थमा दिया। खुद को फंसता देख सिद्दीकी ने 1 जुलाई 2026 को दिए अपने जवाब में पूरी जिम्मेदारी तखतपुर के एसडीओ के सिर मढ़ने की कोशिश की। सिद्दकी ने दलील दी कि एसडीओ की सिफारिश पर ही पैसा लौटाया गया और दूसरे संभागों में भी ऐसा ही होता है। हालांकि प्रमुख अभियंता ने उनके इन लचर तर्कों को खारिज कर दिया। इसके बावजूद जल संसाधन विभाग के उप सचिव रवीन्द्र कुमार मेढ़ेकर के हस्ताक्षर से जो आदेश निकला, उसमें सिर्फ सिद्दीकी की एक वेतनवृद्धि असंचयी प्रभाव से रोकने की मामूली सजा दी गई।
प्रमोशन में भी बड़ा फर्जीवाड़ा, हाईकोर्ट के आदेश की अनदेखी
विभागीय जांच चलने के दौरान किसी भी अफसर को प्रमोशन नहीं दिया जा सकता। फिर सिद्दीकी को ईई से एसई कैसे बना दिया गया? विधायक विद्यावती सिदार ने जब इस विषय पर विधानसभा में ध्यानाकर्षण लगाया तो विभाग ने जवाब में लिख कर दे दिया कि प्रमोशन के समय सिद्दीकी पर कोई विभागीय जांच लंबित नहीं थी। यह सीधे तौर पर सदन में बोला गया सफेद झूठ है।
हाल ही में बिलासपुर हाईकोर्ट ने प्रमोट हुए अधीक्षण अभियंताओं की पोस्टिंग पर रोक लगा दी है। इसके बावजूद विभाग के प्रमुख अभियंता जितेंद्र नेताम ने अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल करते हुए सिद्दीकी को कार्यकारी मुख्य अभियंता (प्रबोधन) की महत्वपूर्ण कुर्सी पर बैठा दिया है।
सचिव के रवैये और ठेकेदारों की मिलीभगत पर उठ रहे सवाल
विभागीय गलियों में अब खुली चर्चा है कि क्या विजय जामनिक पर निलंबन और एफआईआर की गाज सिर्फ इसलिए गिराई गई क्योंकि वे अनुसूचित जाति (एससी) वर्ग से आते हैं? एक को जेल का रास्ता और दूसरे को प्रमोशन, यह सचिव राजेश सुकुमार टोप्पो के पक्षपातपूर्ण रवैये को सामने लाता है।
इस पूरे खेल में जिस ठेकेदार के खाते में समय से पहले एपीएस की रकम गई और जिसने असली आर्थिक मुनाफा कमाया, उसे पूरी तरह बचा लिया गया है। ठेकेदारों पर कोई एफआईआर नहीं हुई। सचिव स्तर के अधिकारियों के संरक्षण के चलते ही ठेकेदारों के हौसले इतने बुलंद हैं कि वे फील्ड में धड़ल्ले से घटिया काम कर रहे हैं। इसी कमीशनखोरी और घटिया निर्माण का नतीजा है कि आए दिन प्रदेश में बांध और नहरें टूटने की खबरें अखबारों की सुर्खियां बन रही हैं।