फर्जी सील से खेल: अतिरिक्त प्रभार संभाल रहे ईई ने अपने स्तर पर बनवाई नई शासकीय मुद्रा, पत्रों पर धड़ल्ले से कर रहे दस्तखत।

जगदलपुर। जल संसाधन मंडल जगदलपुर में नियमों को ताक पर रखकर वित्तीय मनमानी और पद के दुरुपयोग का गंभीर मामला सामने आया है। मंडल में अतिरिक्त प्रभार संभाल रहे प्रभारी अधीक्षण अभियंता वेद प्रकाश पांडे पर गंभीर आरोप लगे हैं। मूल रूप से टीडीपीपी जल संसाधन संभाग में कार्यपालन अभियंता (ईई) के पद पर पदस्थ पांडे ने कथित रूप से राज्य शासन की बिना किसी पूर्व स्वीकृति के अपने स्तर पर ही एक नया पद सृजित कर लिया। हैरानी की बात यह है कि इस गैर-मंजूरशुदा पद की बाकायदा शासकीय सील (मुद्रा) तैयार कराकर वे विभागीय पत्राचार और आदेशों पर हस्ताक्षर कर रहे हैं। इस सील पर लिखा है—‘अधीक्षण अभियंता टीडीडीपी जल संसाधन संभाग जगदलपुर’। विभागीय सूत्रों की मानें तो शासन स्तर पर ऐसा कोई पद स्वीकृत ही नहीं है।

20 नियमित इंजीनियरों को दरकिनार कर रिटायर्ड अफसर पर मेहरबानी

विभागीय सूत्रों के अनुसार, वेद प्रकाश पांडे ने पिछले एक वर्ष से अधिक समय से संभाग स्तरीय लगभग सभी महत्वपूर्ण वित्तीय कार्य रिटायर्ड सहायक अभियंता भक्तमल्ला के हवाले कर रखे हैं। बिलों की स्क्रूटनी से लेकर भुगतान संबंधी सभी गोपनीय और शासकीय दस्तावेज भक्तमल्ला के हाथों से होकर गुजर रहे हैं। चौंकाने वाला तथ्य यह है कि मुख्य अभियंता और अधीक्षण अभियंता कार्यालयों में लगभग 20 नियमित सहायक अभियंता पदस्थ हैं, इसके बावजूद उन्हें दरकिनार कर एक सेवानिवृत्त कर्मचारी को वित्तीय मामलों की कमान सौंपी गई है। भक्तमल्ला बिना किसी अधिकृत संविदा आदेश या प्रशासनिक अनुमति के दफ्तर में बैठकर काम निपटा रहे हैं।

पेंशनर पिता को आश्रित बताकर 42 लाख का मेडिकल क्लेम

गड़बड़ियों का दायरा केवल दैनिक कामकाज तक सीमित नहीं है। सूत्रों के मुताबिक, भक्तमल्ला ने अपने पिता को आश्रित दर्शाकर विभाग से 42 लाख रुपये की भारी-भरकम मेडिकल प्रतिपूर्ति राशि क्लेम की। सेवा नियमों के तहत पेंशनभोगी माता-पिता को आश्रित मानकर इस तरह का क्लेम नहीं लिया जा सकता, जबकि उनके पिता रीवा वन विभाग में अधीक्षक कार्यालय से सेवानिवृत्त पेंशनर हैं। आरोप है कि प्रभारी अधीक्षण अभियंता के पूर्ण समर्थन और मिलीभगत के चलते नियमों को ताक पर रखकर यह भुगतान पास कराया गया।

फर्जी बिलों के भुगतान का सिंडिकेट, उच्चस्तरीय जांच की मांग

विभाग के अंदरूनी सूत्रों का दावा है कि रिटायर्ड अधिकारी की आड़ में लंबे समय से मनमाने फर्जी बिलों को हरी झंडी दी जा रही है। यदि किसी स्वतंत्र तकनीकी व वित्तीय जांच दल से इन बिलों की बारीकी से पड़ताल कराई जाए, तो बड़ा घोटाला उजागर हो सकता है। पूर्व में कई शिकायतें होने और समाचार पत्रों में खुलासे के बाद भी ठोस कार्रवाई न होने से शासन की मंशा पर सवाल उठ रहे हैं। अब स्थानीय स्तर पर इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराने, अनधिकृत सील का उपयोग तत्काल रुकवाने और जिम्मेदारों पर विभागीय कार्रवाई के साथ एफआईआर दर्ज करने की मांग तेज हो गई है।