
विवेचक ने कोर्ट में कहा- जानकारी के बिना ही पेश कर दी क्लोजर रिपोर्ट, आरोपी अधिकारी के पास ही था फाइलों का नियंत्रण
बिलासपुर /कोटा जल संसाधन विभाग कोटा में 'एनीकट कम काजवे' निर्माण में हुए भारी भ्रष्टाचार के मामले में एक और चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) ने जांच के दौरान 25 जनवरी 2019 को विभाग से 19 महत्वपूर्ण बिंदुओं पर जानकारी मांगी थी और 6 बार रिमाइंडर भी भेजे। इसके बावजूद विभाग ने जानकारी दबाए रखी। हद तो तब हो गई जब एसीबी ने आपराधिक दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 91 के तहत मिले कानूनी अधिकारों का उपयोग किए बिना ही 26 मई 2023 को मामले की खात्मा (क्लोजर) रिपोर्ट अदालत में पेश कर दी।
न्यायालय में विवेचक का बयान, जानकारी अग्रिम जांच के लिए थी जरूरी
इस पूरे घोटाले पर पर्दा डालने की कोशिशों की परतें अब कोर्ट में खुल रही हैं। प्रकरण के विवेचक और सेवानिवृत्त पुलिस अधीक्षक एस.पी. करोसिया ने 4 अक्टूबर 2024 को न्यायालय में दिए अपने कथन में स्पष्ट किया है कि उन्होंने अधीक्षण अभियंता (जल संसाधन मंडल बिलासपुर) से मामले की जांच के लिए मूल दस्तावेज मांगे थे। एसीबी के पत्रों में प्रशासकीय एवं तकनीकी स्वीकृति, निविदा, अनुबंध, टेस्ट रिपोर्ट, माप पुस्तिका (एमबी), भौतिक सत्यापन, निरीक्षण प्रतिवेदन और अंतिम देयक की मूल प्रतियां मांगी गई थीं। पत्र में साफ लिखा था कि "अपराध गंभीर प्रकृति का है" और 7 दिन में जानकारी दी जाए। विवेचक ने कोर्ट को बताया कि अग्रिम विवेचना के लिए ये जानकारियां नितांत आवश्यक थीं, लेकिन विभाग ने रिकॉर्ड नहीं दिया।
धारा 91 का नहीं हुआ इस्तेमाल, शिकायतकर्ता ने उठाए सवाल
मामले के परिवादी लक्ष्मीकांत निर्णेजक ने 18 अगस्त 2025 को अपने बयान में बताया कि उन्होंने भी निर्माण अवधि के दौरान पदस्थ अधिकारियों के नाम और पद की जानकारी मांगी थी, जिस पर विभाग ने चुप्पी साध ली। शिकायतकर्ता का सीधा आरोप है कि विवेचक के पास धारा 91 के तहत यह शक्ति थी कि वह न्यायालय के माध्यम से या सीधे तौर पर विभाग से दस्तावेज जब्त कर सकता था। लेकिन जांच एजेंसी ने इस शक्ति का उपयोग ही नहीं किया और बिना मूल अभिलेखों की जांच के ही केस को रफा-दफा कर दिया।
आरोपी के ही नियंत्रण में थीं फाइलें
इस पूरी साजिश का एक बड़ा पहलू आरोपी अधिकारी सिद्दीकी से जुड़ा है। शिकायतकर्ता के मुताबिक 30 सितंबर 2022 को जब श्री सिद्दीकी ने कोटा संभाग के कार्यपालन अभियंता का पद संभाला, तो इस प्रकरण से जुड़े सभी मूल अभिलेख उन्हीं के नियंत्रण में आ गए। आरोप है कि अपने पद का फायदा उठाते हुए उन्होंने एसीबी को 19 बिंदुओं की जानकारी नहीं जाने दी। दस्तावेजों को रोके जाने के ठीक आठ महीने बाद ही 26 मई 2023 को बिना जांच पूरी किए खात्मा रिपोर्ट पेश कर दी गई।
फाइलों से चालाकी से गायब किया गया था 'काजवे' शब्द
यह पूरा विवाद साल 2009 का है। जल संसाधन विभाग ने 17 सितंबर 2009 को कोटा डिवीजन के चांटापारा में आदेश क्रमांक 5346/एफ-1-23/31/एस-2/2009 के तहत "चांटापारा-II एनीकट कम काजवे" योजना को प्रशासकीय मंजूरी दी थी। शासन का स्पष्ट उद्देश्य था कि जनता के पैसे से ऐसी संरचना बने जो पानी भी रोके और जिस पर से ग्रामीणों का आवागमन भी आसानी से हो सके। लेकिन तकनीकी स्वीकृति के समय फाइलों से बड़ी चालाकी से 'काजवे' शब्द ही हटा दिया गया और मौके पर केवल साधारण एनीकट बना दिया गया।
सरकारी दस्तावेजों में इस हेरफेर और कूटरचना को लेकर एसीबी में एफआईआर दर्ज हुई थी, जिसमें आईपीसी की धारा 420, 467, 468, 471, 472 और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1)(डी), 13(2) के साथ 120-बी (आपराधिक साजिश) लगाई गई थी। लेकिन खात्मा रिपोर्ट में दस्तावेजों की कूटरचना जैसी गंभीर धाराओं पर कोई जांच या निष्कर्ष नहीं दिया गया। इसका सीधा फायदा एफआईआर में नामजद आरोपी क्रमांक 4 श्री सिद्दीकी को मिला। काजवे शब्द किसके आदेश से हटा और उसकी स्वीकृत राशि कहां गई, यह आज भी एक बड़ा सवाल है जिस पर विभागीय अधिकारी पुरानी फाइलों का हवाला देकर पल्ला झाड़ लेते हैं।
तारीखों में दर्ज मामले का खेल
- 25 जनवरी 2019: एसीबी ने विभाग से 19 बिंदुओं पर जानकारी मांगी।
- 30 सितंबर 2022: आरोपी सिद्दीकी कोटा संभाग के ईई बने, रिकॉर्ड उनके हाथ में आया।
- 26 मई 2023: मूल दस्तावेजों और जानकारी के अभाव में ही एसीबी ने खात्मा रिपोर्ट पेश की।
- 04 अक्टूबर 2024: विवेचक ने कोर्ट में माना कि विभाग ने 6 रिमाइंडर के बाद भी कोई दस्तावेज नहीं दिया।
क्या कहते हैं सरकारी दस्तावेज?
- प्रशासकीय स्वीकृति: "चांटापारा-II एनीकट कम काजवे" (काजवे शामिल था)
- मौके पर निर्माण: केवल एनीकट बनाया गया (काजवे गायब)
- एफआईआर की धाराएं: 120-बी, 467, 468, 471, 472 भादवि एवं पीसी एक्ट
जानकारी रोकने वाले पर क्या कार्रवाई?
मामले में अब सवाल यह उठ रहा है कि जिस अधिकारी ने जांच को प्रभावित करने के लिए महत्वपूर्ण फाइलों को जानबूझकर दबाए रखा और एसीबी को जानकारी नहीं दी, उस पर अब तक कोई विभागीय या कानूनी कार्यवाही क्यों नहीं हुई?