
बिलासपुर । जिले के कोटा ब्लॉक में जल संसाधन विभाग द्वारा नियमों को दरकिनार कर सरकारी राशि की बंदरबांट का एक और खुलासा हुआ है।
मामला वर्ष 2009 का है। इस दौरान शासन से 'एनीकट कम काजवे' के नाम पर मंजूरी ली गई, लेकिन तकनीकी स्तर पर फाइलों में से बड़ी चालाकी से 'काजवे' शब्द ही गायब कर दिया गया। और मौके पर केवल साधारण एनीकट खड़ा दिया गया, जिससे लोगों को आवागमन का फायदा नहीं मिल सका। इधर एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) में दर्ज मामले की खात्मा (क्लोजर) रिपोर्ट में दस्तावेजों की कूटरचना जैसी गंभीर धाराओं को दरकिनार कर दिया गया है, जिससे एफआईआर में नामजद आरोपी सिद्दीकी को सीधे तौर राहत दे दी गई।
जानिए क्या है पूरा मामला...
जल संसाधन विभाग ने 17 सितंबर 2009 को आदेश क्रमांक 5346/एफ-1-23/31/एस-2/2009 के तहत कोटा डिवीजन के चांटापारा में "चांटापारा-II एनीकट कम काजवे" योजना को प्रशासकीय मंजूरी दी थी। शासन का स्पष्ट उद्देश्य था कि जनता के पैसे से ऐसी संरचना बने जो पानी भी रोके और जिस पर से ग्रामीणों का आवागमन भी आसानी से हो सके।
शिकायत के अनुसार, शासन स्तर पर काजवे निर्माण को लेकर कुछ आपत्तियां थीं। अधिकारियों ने इसे छिपाते हुए "एनीकट कम काजवे" के नाम पर प्रशासकीय स्वीकृति ले ली। बाद में, तकनीकी स्वीकृति के स्तर पर नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए "काजवे" शब्द को चुपचाप फाइलों से हटा दिया गया। नतीजा यह हुआ कि मौके पर सिर्फ एनीकट बना और काजवे के नाम का पैसा और योजना दोनों फाइलों में दफन हो गए।
नियमों को किया गया दरकिनार, दर्ज हुई थी एफआईआर
सरकारी दस्तावेजों में हेरफेर करना और मूल स्वीकृति को बदलना गंभीर अपराध है। इसी अनियमितता को लेकर एसीबी में एफआईआर दर्ज की गई थी। इसमें स्पष्ट तौर पर यह दर्ज है कि मूल स्वीकृति बदलकर काजवे शब्द हटाना भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 420 (धोखाधड़ी), 467, 468, 471 एवं 472 (दस्तावेजों में कूटरचना) के अंतर्गत दंडनीय कृत्य है। इसके साथ ही मामले में धारा 120-बी और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1)(डी), 13(2) भी जोड़ी गई थी।
खात्मा रिपोर्ट मौन, जांच पर उठे गंभीर सवाल
मामले का खुलासा तब हुआ जब जांच के बाद खात्मा प्रतिवेदन पेश किया गया। शिकायतकर्ता का आरोप है कि इस रिपोर्ट में कूटरचना (फर्जीवाड़े) से जुड़ी अहम धाराओं पर कोई जांच या निष्कर्ष ही नहीं दिया गया है।
आखिर काजवे शब्द किस स्तर पर और किसके आदेश से हटाया गया? जिस काजवे का निर्माण नहीं हुआ, उसके हिस्से की स्वीकृत राशि कहां गई? इन सवालों को खात्मा रिपोर्ट में पूरी तरह दबा दिया गया है।
आरोपी सिद्दीकी को पहुंचाया गया लाभ..
रिकॉर्ड की इस हेराफेरी में एफआईआर के आरोपी क्रमांक 4, श्री सिद्दीकी को सबसे बड़ा लाभ मिला है। उन पर भी कूटरचना और धोखाधड़ी की इन्हीं धाराओं के तहत प्रकरण दर्ज हुआ था। शिकायतकर्ता के मुताबिक, इन धाराओं पर बिना किसी निष्कर्ष के रिपोर्ट बंद करने का सीधा मतलब है कि मौन बैठे आरोपी को कानून के फंदे से सुरक्षित बाहर निकाल लिया गया।
क्या कहते हैं सरकारी दस्तावेज?
प्रशासकीय स्वीकृति में नाम: चांटापारा-II एनीकट कम काजवे मौके पर निर्माण, केवल एनीकट (काजवे गायब) एफआईआर की धाराएं: 120-बी, 467, 468, 471, 472 भादवि एवं 13(1) (डी), 13(2) भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम।
इस भारी गड़बड़ी पर फिलहाल विभागीय अधिकारियों ने चुप्पी साध रखी है। जब भी फाइलों से शब्द गायब होने और राशि के उपयोग पर सवाल किया जाता है, तो जिम्मेदार अधिकारी पुरानी फाइलें और तकनीकी कारणों का हवाला देकर पल्ला झाड़ लेते हैं। अधिकारियों का यह मौन ही इस बात की गवाही दे रहा है कि सिस्टम ने अपने चहेतों और ठेकेदारों को लाभ पहुंचाने के लिए नियमों की किस तरह बलि चढ़ाई है।