
रायपुर। सूबे में हुए कथित शराब घोटाले की जांच की आंच जब रसूखदारों तक पहुंची थी और पूर्ववर्ती सरकार के आबकारी मंत्री को सलाखों के पीछे दिन काटने पड़े थे, तो लगा था कि अब शायद सिस्टम सुधर जाएगा। सबक लेने के लिए यह दृष्टांत काफी था। उम्मीद थी कि इतने बड़े महाघोटाले के पर्दाफाश के बाद जवाबदेही तय होगी और शराब कारोबार में पसरी सड़ांध पर लगाम लगेगी। मगर सूबे की बदकिस्मती देखिए, इंसानी फितरत का यह सबसे स्याह पहलू है कि वह आसानी से नहीं बदलता। यह काला खेल आज भी उसी बेखौफ अंदाज में धड़ल्ले से जारी है।
ओवर रेटिंग महज बुखार, बीमारी तो कैंसर जैसी
सरकारी शराब दुकानों की रीढ़ मानी जाने वाली प्लेसमेंट कंपनियां इस पूरे सिंडिकेट की सबसे अहम कड़ी बनी हुई हैं। दुकानों में बैठे कर्मचारी इन्हीं कंपनियों के रहमोकरम पर रखे जाते हैं और यहीं से इस खेल की असली पटकथा लिखी जाती है। आबकारी विभाग समय-समय पर ओवर रेटिंग के खिलाफ दिखावे की कार्रवाई कर यह संदेश देने की कोशिश करता है कि उसकी व्यवस्था पर पैनी नजर है। लेकिन कवर्धा और उसके आस-पास जिस तरह से ओवर रेटिंग और मिलावट का खेल सामने आया है, उसने बता दिया है कि ओवर रेटिंग तो महज एक सतही बुखार है, असली बीमारी कहीं ज्यादा गहरी और जानलेवा है।
कार्रवाई की जगह 'तबादले' का रिटर्न गिफ्ट
मजे की बात देखिए, कवर्धा मामले में जिन दो इंस्पेक्टरों पर गाज गिरनी चाहिए थी, जिन पर कड़ी दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए थी, उन्हें महज ट्रांसफर कर मामले की 'इतिश्री' कर दी गई। आखिर यह कौन सा शक्तिशाली नेता और अधिकारी है, जो इन दागी अफसरों को बचाने के लिए ढाल बनकर खड़ा है? सस्पेंस यही है कि आखिर ट्रांसफर का यह वीआईपी ट्रीटमेंट किसके इशारे पर दिया जा रहा है।
कोलकाता से होलोग्राम, सत्ताधारी नेता का कनेक्शन
हाल ही में जब पुलिस ने मिलावटी शराब के मामले में प्रकरण दर्ज किया, तो शुरुआती तौर पर यह सामान्य मिलावट का मामला लगा। लेकिन जैसे-जैसे जांच के पन्ने पलटे, पूरा नेक्सस उजागर होता चला गया। पुलिस को शायद खुद भी अंदाजा नहीं था कि उसने किस बर्रै के छत्ते में हाथ डाल दिया है। जांच में साफ हुआ कि इस मिलावटी शराब के पूरे लॉजिस्टिक्स, सप्लाई चेन और वितरण तंत्र के पीछे सत्ताधारी दल के ही एक नेता का सीधा हाथ है। खेल सिर्फ शराब में पानी या केमिकल मिलाने तक सीमित नहीं था, बल्कि बाकायदा कोलकाता से नकली होलोग्राम मंगाए जा रहे थे, ताकि इस मिलावटी जहर को सरकारी दुकान से खरीदी गई असली बोतल का लिबास पहनाया जा सके। यह नेता कोई अदना सा कार्यकर्ता नहीं है, राजधानी से लेकर न्यायधानी तक उसके रसूख के तार मजबूती से जुड़े हैं।
साजिश का मास्टरमाइंड कौन?
अब सबसे बड़ा सवाल सत्ता के गलियारों में गूंज रहा है। राज्य में सुशासन का दावा करने वाली 'डबल इंजन' की सरकार है। प्रदेश की कमान एक ऐसे आदिवासी मुख्यमंत्री के हाथ में है, जिनका चेहरा बेहद सौम्य है और छवि एक सीधे नेता की है। तो फिर यह पूरा सिंडिकेट किसके दम पर फल-फूल रहा है? क्या यह उसी सीधे-सादे आदिवासी मुख्यमंत्री को बदनाम करने और उन्हें 'आदिवासी विरोधी' साबित करने की कोई सोची-समझी गहरी साजिश है? आखिर इसके पीछे का असली साजिशकर्ता कौन है, जो रसूख के नशे में चूर होकर सरकार की छवि को दांव पर लगा रहा है?
रसूख का नशा हर सरकार में सिर चढ़कर बोलता है, लेकिन देखना यह है कि इस बार यह नशा सिस्टम को लीलता है या फिर सुशासन का चाबुक इन सफेदपोश मिलावटखोरों पर चलता है।