भिलाई/बिलासपुर : भिलाई-3 के सिरसाकला निवासी 74 वर्षीय श्री रामशरण चंद्राकर का मंगलवार, 29 जुलाई की सुबह 4:40 बजे रायपुर जिले के आरंग में निधन हो गया । परिवार के लिए यह पल गहरे दुःख और अपूरणीय क्षति का था, लेकिन इस कठिन समय में भी परिजनों ने मानवता और समाज सेवा का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया, जो लंबे समय तक प्रेरणा देता रहेगा ।

समाज में देहदान के प्रति जागरूकता और सकारात्मक संदेश

परिजनों सभी पारंपरिक धार्मिक रीति-रिवाजों और अंतिम संस्कार की विधियों का विधिवत पालन करने के बाद रामशरण चंद्राकर के पार्थिव शरीर का देहदान कर चिकित्सा शिक्षा एवं शोध कार्यों के लिए समर्पित कर दिया। शोक की इस घड़ी में लिया गया परिवार का यह संवेदनशील और प्रेरणादायक निर्णय न केवल मानव सेवा की भावना को दर्शाता है, बल्कि समाज में देहदान के प्रति जागरूकता और सकारात्मक संदेश भी देता है ।

परिजनों ने बताया कि रामशरण चंद्राकर की इच्छा और समाज सेवा की भावना को आगे बढ़ाते हुए उनके पुत्रों ने यह निर्णय लिया कि उनका पार्थिव शरीर भविष्य के चिकित्सकों की शिक्षा और वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए उपयोगी बने । इस उद्देश्य से उनके दामाद डॉ. जीतेंद्र कुमार सिंगरौल ने शासकीय आयुर्वेद चिकित्सा महाविद्यालय, बिलासपुर के शरीर रचना विभागाध्यक्ष डॉ. प्रशांत निषाद से संपर्क किया ।

सूचना मिलते ही डॉ. प्रशांत निषाद के नेतृत्व में महाविद्यालय की टीम ने त्वरित कार्रवाई करते हुए देहदान से जुड़ी सभी आवश्यक एवं कानूनी औपचारिकताएं पूरी कराईं । इस दौरान टीम के सदस्य धीरज और रोहित मांझी ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे पूरी प्रक्रिया सरल और व्यवस्थित ढंग से संपन्न हो सकी ।

शोक की घड़ी में मानवता और समाजहित को सर्वोपरि

इस पुनीत कार्य में रामशरण चंद्राकर के बड़े बेटे बाल कृष्ण चंद्राकर, छोटे बेटे मनीष चंद्राकर तथा बेटी सुमन सिंगरौल का विशेष योगदान रहा । परिवार के इस निर्णय की क्षेत्रभर में सराहना की जा रही है । लोगों का कहना है कि शोक की घड़ी में भी मानवता और समाजहित को सर्वोपरि रखते हुए लिया गया यह निर्णय दूसरों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगा ।

एनाटॉमी की पढ़ाई में पार्थिव शरीर का अमूल्य योगदान

देहदान को चिकित्सा शिक्षा और शोध के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है । मेडिकल कॉलेजों में मानव शरीर रचना (एनाटॉमी) की पढ़ाई और विभिन्न वैज्ञानिक अनुसंधानों के लिए ऐसे दान किए गए पार्थिव शरीर अमूल्य योगदान देते हैं । चंद्राकर परिवार का यह निर्णय न केवल मानव सेवा का उदाहरण है, बल्कि समाज में देहदान के प्रति जागरूकता बढ़ाने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है ।