
रायपुर/कोरबा: विकास और राजस्व के दावों के बीच छत्तीसगढ़ का कोरबा जिला एक बार फिर 'काले हीरे की काली कमाई' का सबसे बड़ा केंद्र बन गया है। भ्रष्टाचार का आलम यह है कि जो कोयला सरकारी खजाने को रोशन करने के लिए खदानों से निकलता है, वह रास्ते में ही जादुई रिमोट के जरिए सफेदपोश नेताओं और भ्रष्ट अफसरों की तिजोरियों में एडजस्ट हो रहा है।
प्रदेश के कद्दावर आदिवासी नेता और पूर्व गृहमंत्री ननकीराम कंवर ने इस महाघोटाले का भंडाफोड़ करते हुए सीधे सीबीआई (CBI) के चीफ प्रवीण सूद को एक बेहद सनसनीखेज चिट्ठी लिखी है। इस पत्र ने सत्ता के गलियारों से लेकर एसईसीएल (SECL) और रेलवे के दफ्तरों में हड़कंप मचा दिया है। आरोप छोटे-मोटे नहीं हैं, बल्कि हर साल 10 हजार करोड़ रुपये से अधिक की राष्ट्रीय संपत्ति को डकारने के हैं।
रिमोट कंट्रोल से चल रहा लूट का डिजिटल तिलिस्म
इसे भ्रष्टाचार के क्षेत्र में तकनीक का अद्भुत और व्यंग्यात्मक इस्तेमाल ही कहेंगे। खदानों से निकलने वाले कोयले की चोरी अब गैंती-फावड़े से नहीं, बल्कि इलेक्ट्रॉनिक सेंसर और रिमोट से हो रही है। कंवर के पत्र के अनुसार, एसईसीएल की रेलवे रेक लोडिंग और रोड सेल के धर्मकांटों (वे-ब्रिज) पर माफिया और अफसरों की मिलीभगत से एक खास चिप/सेंसर लगाया गया है।
माफिया का गुर्गा 1 से 1.5 किलोमीटर दूर बैठकर रिमोट का बटन दबाता है और डिस्प्ले स्क्रीन पर वजन जादुई तरीके से आधा हो जाता है। मसलन, अगर किसी रेलवे बोगी में 70 टन कोयला है, तो वह स्क्रीन पर 45 या 50 टन ही दिखेगा। 50 टन वाले ट्रक का वजन 25 टन हो जाता है। जादूगर पीसी सरकार भी यह तिलिस्म देखकर चकरा जाएं कि आखिर बाकी का 25 टन कोयला हवा में कैसे उड़ गया? दरअसल, यह कोयला हवा में नहीं उड़ता, बल्कि सीधे भ्रष्ट सिस्टम की जेबों में 'लॉन्डर' हो जाता है।
लूटतंत्र के महारथी: कौन-कौन है इस सिंडिकेट में?
ननकीराम कंवर की शिकायत के अनुसार, यह कोई छिटपुट चोरी नहीं है, बल्कि 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' की तर्ज पर चल रहा एक बेहद संगठित और खौफनाक सिंडिकेट है। इस 'जॉइंट वेंचर' में जिले का प्रशासन, पुलिस, रेलवे और खदान प्रबंधन सब बराबर के साझीदार बताए गए हैं।
शिकायत में जिन रसूखदारों को नामजद किया गया है, उनकी सूची किसी भी सरकार के पसीने छुड़ाने के लिए काफी है:
एसईसीएल (SECL) के दिग्गज: राजीव सिंह (जी.एम. कुसमुंडा), जी.एम. दीपका, और जी.एम. गेवरा।
प्रशासनिक और पुलिस अमला: कोरबा कलेक्टर अजीत बसंत, जिले का पूरा पुलिस प्रशासन और माइनिंग अधिकारी।
रेलवे के 'खिलाड़ी': विकास कश्यप (जी.एम. कमर्शियल), प्रमोद नायक, मनीकृत भुजाल (कमर्शियल इंचार्ज चीफ इंस्पेक्टर)।
कोल माफिया: इस पूरे खेल का मास्टरमाइंड कोरबा निवासी अमित नेपाली, जिसे कई बड़े सफेदपोश राजनेताओं और राज्य शासन के बड़े अफसरों का संरक्षण प्राप्त है।
बरपाली बंद हुआ तो कोरबा स्टेशन बना नया अड्डा
इस गिरोह की ढिठाई का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब पूर्व में बरपाली रेलवे स्टेशन साइडिंग पर यह खेल चल रहा था और कंवर की शिकायत पर केंद्र सरकार ने सख्ती की, तो धंधा बंद करने के बजाय इन्होंने अपना स्टेशन ही बदल लिया।
अब यह पूरा गोरखधंधा लोड एडजस्टमेंट के नाम पर खुलेआम कोरबा रेलवे स्टेशन की साइडिंग पर चल रहा है। कुसमुंडा, दीपका और गेवरा से भरी रेक (बोगियों) को स्टेशन पर रोक कर, वजन कम करने के बहाने उतारा जाता है। इसके बाद, यह अवैध कोयला माइनिंग अधिकारियों की सांठगांठ से फर्जी रॉयल्टी पर्ची हासिल कर सीधे खुले बाजार में बेच दिया जाता है।
कहाँ खप रहा है चोरी का माल?
चोरी का यह काला माल खपाने के लिए बाकायदा एक अवैध डंपिंग यार्ड तैयार किया गया है। कंवर के मुताबिक, कोल माफिया अमित नेपाली का जांजगीर-चांपा जिले के ग्राम सिवनी में 'गणेशा कोल डिपो' के नाम से एक ठिकाना है। यहीं से राज्य और केंद्र सरकार को हजारों करोड़ का चूना लगाकर अवैध कोयले की सरेआम बिक्री होती है।
CBI से सीधे हस्तक्षेप की मांग और राजनीतिक भूचाल
एक तरफ राज्य सरकार सुशासन और पारदर्शी प्रशासन के ढोल पीट रही है, वहीं दूसरी तरफ उसी की पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने प्रशासन (खासकर कोरबा कलेक्टर और पुलिस) की कार्यप्रणाली की बखिया उधेड़ कर रख दी है।
ननकीराम कंवर ने सीबीआई निदेशक से दो टूक शब्दों में मांग की है कि धर्मकांटों पर लगे उन जादुई सेंसरों की तत्काल जांच हो और प्रतिवर्ष 10 हजार करोड़ की डकैती डालने वाले इस संगठित गिरोह पर केंद्रीय एजेंसी एफआईआर दर्ज कर कड़ी कार्रवाई करे। अब देखना यह है कि सीबीआई इस 'हाई-प्रोफाइल' सिंडिकेट के गिरेबान तक पहुंचती है, या फिर यह शिकायत भी सत्ता के उसी 'रिमोट कंट्रोल' से एडजस्ट कर दी जाएगी, जिससे कोयला एडजस्ट किया जा रहा है।




