
रायपुर। छत्तीसगढ़ और ओडिशा राज्य के बीच महानदी के जल बंटवारे को लेकर लंबे समय पहले महानदी जल विवाद अभिकरण (ट्रिब्यूनल) का गठन किया गया था। इस ट्रिब्यूनल की जिम्मेदारी तत्कालीन सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बेला त्रिवेदी को सौंपी गई थी। वे अपने पद से सेवानिवृत्त हो चुकी हैं, लेकिन वर्तमान में भी अभिकरण के अध्यक्ष पद पर काबिज हैं। इस पूरे मामले में चौंकाने वाला पहलू यह है कि पिछले 5 वर्षों के दौरान जल विवाद अभिकरण में राज्य शासन का पक्ष रखने के लिए वकीलों को लगभग 75 करोड़ रुपए की भारी-भरकम राशि का भुगतान किया जा चुका है। करोड़ों रुपए खर्च किए जाने के बावजूद, इस केस में अब तक कोई प्रगति नहीं हुई है और नतीजा शून्य है।
महंगे रिटायर अफसरों का काम निराशाजनक
इस पूरे मामले में छत्तीसगढ़ राज्य की ओर से अभिकरण को तमाम जरूरी जानकारियां और तथ्य प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी जिन लोगों को दी गई थी, उनका प्रदर्शन पूरी तरह निराशाजनक रहा है। विभाग ने इस महत्वपूर्ण कार्य के लिए सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता आरके नगरिया (सेवानिवृत्ति: 30 अप्रैल 2023), आरएस नायडू (सेवानिवृत्ति: 31 दिसंबर 2021) और कार्यपालन अभियंता जयंत कुमार बिसेन की नियुक्ति की है।
विभागीय कार्यालय में बैठे इन अफसरों का वेतन काफी ज्यादा है। आरएस नायडू जनवरी 2022 से और आरके नगरिया मई 2023 से लगातार विभाग से सैलरी ले रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि ये दोनों अधिकारी अपनी नियमित पेंशन तो प्राप्त कर ही रहे हैं, उसके अतिरिक्त इन्हें डेढ़ लाख रुपए प्रतिमाह का वेतन भी दिया जा रहा है। हर महीने डेढ़ लाख रुपए लेने के बाद भी, ये अधिकारी अभिकरण के सामने कोई भी सटीक और जरूरी जानकारी पेश करने में अब तक नाकाम रहे हैं। विभागीय सूत्रों की मानें तो इन्हीं कारणों से महानदी जल विवाद मामले में अब तक कोई भी प्रगति नहीं हो सकी है।
बोधघाट परियोजना में 13 करोड़ का निष्फल व्यय
मुख्य अभियंता आरके नगरिया की पुरानी कार्यप्रणाली पहले भी विवादों में रही है। नगरिया वही अधिकारी हैं जिन्होंने बोधघाट परियोजना के सर्वेक्षण कार्य में ठेकेदार को करीब 13 करोड़ रुपए की बड़ी राशि का भुगतान कर दिया था। इतनी बड़ी रकम चुकाने के बाद भी बोधघाट परियोजना में आज तक कोई भी आशातीत प्रगति नहीं हुई है। कुल मिलाकर वह 13 करोड़ रुपए पूरी तरह से निष्फल व्यय साबित हुआ। इसी तरह, इसी अधिकारी ने सर्वेक्षण के नाम पर 44 करोड़ रुपए का फर्जी प्राक्कलन तैयार करवाया और बाद में उसे तकनीकी स्वीकृति भी दे दी थी।
विवाद उलझाए रखने की मंशा
इन तमाम परिस्थितियों और अधिकारियों की कार्यप्रणाली को देखकर इनकी मंशा का पता चलता है। ऐसा प्रतीत होता है कि इन सेवानिवृत्त अधिकारियों का मुख्य इरादा यही है कि महानदी का यह जल विवाद अनसुलझा ही रहे, ताकि इन्हें अपनी सरकारी पेंशन के अतिरिक्त मिलने वाला डेढ़ लाख रुपए का वेतन आजीवन मिलता रहे।