
रायपुर। छत्तीसगढ़ में 2500 करोड़ रुपये का पैरी प्रोजेक्ट इन दिनों प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चित है। काम सिकासेर जलाशय से कोडार जलाशय तक लिंक नहर और पाइपलाइन बिछाने का है। भारी-भरकम बजट वाला यह ठेका मध्य प्रदेश की कंपनी दिलीप बिल्डकॉन के खाते में गया है। हाईकोर्ट से कंपनी को तकनीकी मोर्चे पर क्लीन चिट मिल चुकी है। बावजूद इसके, जल संसाधन विभाग की टेंडर प्रक्रिया शक के दायरे में आ चुकी है। रातों-रात नियम बदलना। आधी रात को एल-वन (सबसे कम बोली) की घोषणा। भोपाल से नागपुर तक फैले कथित राजनीतिक रसूख ने इस विशालकाय प्रोजेक्ट की पारदर्शिता को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
जल संसाधन विभाग ने मई के महीने में टेंडर जारी किया था। जून में प्री-बिड बैठकों का दौर चला। शुरुआत में सब कुछ सामान्य था। फिर अचानक खेल पलट गया। तकनीकी शर्तों में रातों-रात बदलाव कर दिए गए। आनन-फानन में शुद्धि-पत्र थमा दिए गए। राज्य के स्थानीय और सालों से जमे हुए ठेकेदारों का पूरा गणित बिगड़ गया। उन्हें नए सिरे से कागजात तैयार करने थे। इसके लिए विभाग से समय मांगा गया। ठेकेदारों ने तर्क दिया कि नए नियमों को समझने और उसके हिसाब से दस्तावेज जुटाने में वक्त लगेगा। विभाग ने समय सीमा बढ़ाने से दो टूक मना कर दिया।
इसके बाद जो हुआ, उसने मंत्रालय के अफसरों से लेकर ठेकेदारों तक को चौंका दिया। जुलाई के आखिरी हफ्ते में आधी रात को टेंडर खोला गया। दिलीप बिल्डकॉन को एल-वन घोषित कर टेंडर फाइनल कर दिया गया।
टेंडर की रेस से बाहर हुए ठेकेदार हाईकोर्ट पहुंचे। उन्होंने प्रक्रिया पर सवाल उठाए। कोर्ट ने तकनीकी आधार पर याचिकाएं खारिज कर दीं। अदालत ने माना कि पक्षपात या दुर्भावना साबित करने के लिए याचिकाकर्ताओं के पास कोई ठोस कानूनी आधार मौजूद नहीं है। कागजी तौर पर रास्ता पूरी तरह साफ हो गया।
फिर भी, मंत्रालय के भीतर सत्ता, कॉरपोरेट और सिंडिकेट के गठजोड़ पर कानाफूसी जारी है। सबसे ज्यादा चर्चा 'भोपाल-नागपुर कनेक्शन' की है। दिलीप बिल्डकॉन मूल रूप से भोपाल आधारित कंपनी है। मध्य प्रदेश में पिछली सरकारों के समय इस कंपनी ने छोटी ठेकेदारी से शुरुआत की थी। आज यह देश की बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों में गिनी जाती है। राज्य के ठेकेदारों में दबी जुबान में चर्चा है कि मध्य प्रदेश और केंद्रीय स्तर के राजनीतिक रसूख का पूरा इस्तेमाल हुआ।
इसी प्रभाव के चलते छत्तीसगढ़ में टेंडर के समीकरण कंपनी के अनुकूल किए गए। टेंडर प्रक्रिया के अंतिम चरण में जो शुद्धि-पत्र जारी हुआ, उसे भी इसी राजनीतिक छत्रछाया का हिस्सा माना जा रहा है। शर्तें इतनी अचानक और सख्त तरीके से बदली गईं कि कई बड़ी राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय कंपनियां दौड़ से ही बाहर हो गईं। प्रतिस्पर्धा सीमित कर दी गई।
अब बड़ा सवाल राज्य के खजाने का है। जब टेंडर में ज्यादा कंपनियां बची ही नहीं, तो सरकार को किफायती दरें कैसे मिलेंगी? बिना तगड़े कंपटीशन के खजाने को चूना लगने का अंदेशा बना हुआ है। राज्य में नई सरकार बनने के बाद सुशासन और भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस का दावा किया गया था। लेकिन पैरी प्रोजेक्ट में पड़ोसी राज्यों के रसूखदार सिंडिकेट की कथित एंट्री ने स्थानीय कंस्ट्रक्शन जगत में भारी नाराजगी भर दी है। छत्तीसगढ़ के ठेकेदार खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। उनका मानना है कि टेंडर अगर पारदर्शी तरीके से होता, तो सरकार को बेहतर रेट मिलते।
विवादों के बीच अब निर्माण की गुणवत्ता भी रडार पर रहेगी। 2500 करोड़ का बजट सिर्फ सीमेंट, गिट्टी या पाइपलाइन बिछाने का नहीं है। यह आम जनता के टैक्स का पैसा है। अफसर भी जानते हैं कि यह प्रोजेक्ट अब मीडिया और विपक्ष की लगातार निगरानी में रहेगा। थोड़ी सी भी चूक भारी राजनीतिक बवाल खड़ा कर सकती है।
परियोजना के तहत सिकासेर से कोडार तक पानी पहुंचने से लाखों हेक्टेयर खेतों की सिंचाई होगी। पानी लाने की इस योजना पर कोई ऐतराज नहीं है। विवाद सिर्फ टेंडर बांटने की प्रक्रिया पर है। शर्तों के मुताबिक दिलीप बिल्डकॉन को निर्माण कार्य 30 महीने के भीतर पूरा करना होगा। निर्माण पूरा होने के बाद अगले 5 साल तक पूरे ढांचे के मेंटेनेंस का जिम्मा भी इसी कंपनी के पास रहेगा।