
जल संसाधन विभाग • जांच चलने के दौरान ही दे दी उच्च जिम्मेदारी, दंड लागू होने के बाद भी कुर्सी पर बरकरार
रायपुर। जल संसाधन विभाग में पोस्टिंग और प्रभार को लेकर बड़ा खेल जारी है। विभाग ने अधीक्षण अभियंता आई. ए. सिद्दीकी को अनुशासनात्मक कार्रवाई का सामना करने और वेतनवृद्धि रोकने का दंड मिलने के बावजूद मुख्य अभियंता (प्रबोधन) जैसा महत्त्वपूर्ण और उच्च प्रभार सौंप दिया है। उच्च पदस्थ सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार 24 मार्च 2026 को कारण बताओ नोटिस जारी होने और 7 सितंबर 2026 को दंड लागू होने के बीच, 13 अगस्त 2026 को गुपचुप तरीके से प्रमुख अभियंता कार्यालय ने प्रभार सौंपने का आदेश जारी कर दिया। अब इस पूरे मामले में सामान्य प्रशासन विभाग के नियमों की अनदेखी और प्रशासनिक जवाबदेही पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं।
नोटिस का जवाब आने के बाद भी दे दी उच्च जिम्मेदारी
कार्यालय प्रमुख अभियंता के आदेश क्रमांक 331/2020/छ ग/2023 के तहत यह पूरी कवायद की गई। दरअसल, मुख्य अभियंता (प्रबोधन) एस. के. भागवत की संविदा नियुक्ति अवधि समाप्त हो गई थी। इसके बाद वैकल्पिक व्यवस्था के नाम पर जल संसाधन एवं भू-जल सर्वेक्षण मंडल, रायपुर के अधीक्षण अभियंता आई. ए. सिद्दीकी को यह जिम्मेदारी दी गई। विभागीय सूत्रों के मुताबिक, सिद्दीकी के खिलाफ 24 मार्च 2026 को ही शासन ने कारण बताओ सूचना पत्र जारी कर दिया था। अधिकारी ने 1 जुलाई 2026 को अपना जवाब भी प्रस्तुत कर दिया। इसके बावजूद 13 अगस्त को उन्हें प्रमोट करते हुए मुख्य अभियंता का अतिरिक्त प्रभार दे दिया गया।
7 सितंबर को लागू हुआ दंड, प्रभार अब भी बरकरार
शासन स्तर पर अधिकारी के जवाब और प्रमुख अभियंता के अभिमत का परीक्षण करने के बाद, अनुशासनात्मक प्रकरण में उन्हें दोषी पाया गया। उन पर अनुबंध की शर्तों और छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1965 के नियम 3 के उल्लंघन का मामला पुष्ट हुआ। इसके तहत 7 सितंबर 2026 से एक वेतनवृद्धि असत्यता प्रमाण से रोकने की शास्ति (दंड) लागू कर दी गई। नियमों के तहत दंडित अधिकारी को उच्च पद की जिम्मेदारी से मुक्त किया जाना चाहिए, लेकिन विभाग ने आज तक प्रभार वापस लेने या इस वैकल्पिक व्यवस्था की समीक्षा करने की जहमत नहीं उठाई। कार्यभार आदेश में साफ लिखा है कि वेतन और भत्ते मूल पदस्थापना कार्यालय से ही आहरित होंगे, जो इसे मात्र अस्थायी व्यवस्था बनाता है।
प्रमुख अभियंता कार्यालय की भूमिका संदिग्ध
इस पूरे मामले में सबसे बड़ी विसंगति यह है कि दंड आदेश में प्रमुख अभियंता का अभिमत शामिल था। उसी प्रमुख अभियंता कार्यालय ने 13 अगस्त को अतिरिक्त कार्यभार का आदेश भी जारी किया। ऐसे में यह सवाल उठता है कि जब अधिकारी के खिलाफ जांच चल रही थी और अनुशासनात्मक प्रकरण लंबित था, तब उन्हें उच्च जिम्मेदारी के लिए उपयुक्त कैसे मान लिया गया? कार्यभार सौंपते समय अनुशासनात्मक रिकार्ड का मूल्यांकन क्यों नहीं हुआ?
अंदरखाने की बात: सामान्य प्रशासन विभाग के निर्देशों की अनदेखी
जल संसाधन विभाग ने सामान्य प्रशासन विभाग के उन स्पष्ट निर्देशों को भी दरकिनार कर दिया, जिनमें दागी या अनुशासनात्मक कार्रवाई का सामना कर रहे अधिकारियों को अहम पदों से दूर रखने का प्रावधान है। दंड आदेश में केवल वेतनवृद्धि रोकने की शास्ति है, उसमें पदोन्नति रोकने या उच्च पद का प्रभार देने पर अलग प्रतिबंध दर्ज नहीं है। इसी तकनीकी खामी का फायदा उठाकर विभाग ने इस ‘अस्थायी व्यवस्था’ को निरंतर जारी रखा है।
विभाग से 6 सवाल, जिनका जवाब मिलना बाकी है...
- दंड लागू होने के बाद क्या मुख्य अभियंता का अतिरिक्त कार्यभार जारी रखने की समीक्षा हुई?
- अगस्त में कार्यभार सौंपते समय अनुशासनात्मक प्रकरण और 24 मार्च के नोटिस का संज्ञान लिया गया था या नहीं?
- दागी अधिकारी को उच्च जिम्मेदारी के लिए उपयुक्त मानने का क्या आधार फाइलों में दर्ज है?
- सामान्य प्रशासन विभाग का कौन-सा परिपत्र और विभागीय नियम इस पोस्टिंग में लागू किया गया?
- क्या दंड आदेश पर कोई स्थगन, संशोधन या निरस्तीकरण हुआ है?
- क्या अगस्त के कार्यभार आदेश के बाद विभाग ने कोई नया आदेश जारी किया है?
अब उच्च स्तर पर शिकायत ....
मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि इस मामले की शिकायत उच्च स्तर पर कर दी गई है। जल्द ही सामान्य प्रशासन विभाग इस मामले में जल संसाधन विभाग से जवाब-तलब कर सकता है। यदि नियमों के परीक्षण में अतिरिक्त कार्यभार जारी रखना अनुचित पाया जाता है, तो आदेश को निरस्त करने के साथ-साथ इस प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों पर भी कार्रवाई हो सकती है। नियमसम्मत स्थिति स्पष्ट होने पर आने वाले दिनों में प्रभार छीना जा सकता है।