रायपुर। छत्तीसगढ़ के उद्यानिकी महकमे का मैदानी कामकाज इन दिनों पूरी तरह बैसाखियों के सहारे घिसट रहा है। सूबे के 33 में से 11 जिले ऐसे  हैं, जिन्हें कोई परमानेंट जिला अधिकारी ही नसीब नहीं हुआ। जिसका नतीजा यह है कि पड़ोस या फिर सैकड़ों किलोमीटर दूर बैठे अफसरों के माथे दो-तीन जिलों का भारी-भरकम बोझ लादकर महकमे की जुगाड़ वाली गाड़ी धकेली जा रही है।

साहब लोगों की मूल पोस्टिंग वाले जिले और प्रभार वाले जिले के बीच 200 से लेकर 300 किलोमीटर तक का लंबा-चौड़ा फासला है। अफसरों की आधी से ज्यादा ड्यूटी अब ऑफिस की कुर्सियों पर नहीं, बल्कि सड़क के हिचकोलों में बीत रही है। लगातार पेंडुलम की तरह झूलने से मैदानी मुआयने, योजनाओं की मॉनिटरिंग और आम जनसुनवाई का बुरी तरह भट्ठा बैठ गया है। इस पूरी फजीहत की चाबी पिछले दो साल से मंत्रालय की फाइलों में धूल खा रही है। महकमे के करीब सात अधिकारियों की विभागीय पदोन्नति समिति (डीपीसी) पेंडिंग पड़ी है। अगर यह प्रमोशन वाली फाइल टेबल से खिसक जाए, तो रातों-रात कम से कम सात जिलों की यह 'प्रभार वाली आफत' हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी।

सड़क नापने में ही स्वाहा हो रहा पूरा दिन

कबीरधाम से कोरिया की दूरी 287 किलोमीटर है। कबीरधाम में विजय त्रिपाठी तैनात हैं, लेकिन उन्हें कोरिया के साथ-साथ मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर का भी बोझा थमा दिया गया है। आने-जाने में ही 14 घंटे झोंकने पड़ जाते हैं। अब आप खुद सोचिए, मीटिंग या फील्ड मुआयने के नाम पर अफसर का पूरा दिन महज सफर की थकान में ही निकल जाता है।
कांकेर से दंतेवाड़ा का दर्द भी जुदा नहीं है। कांकेर में पोस्टेड मीना मंडावी के कंधों पर दंतेवाड़ा की अतिरिक्त जिम्मेदारी डाल दी गई है। 215 किलोमीटर की दूरी नापने में 9 घंटे खप जाते हैं। बस्तर संभाग का रोना भी कम नहीं है। जगदलपुर वाले अधिकारी नारायणपुर और कोंडागांव का चक्कर काट रहे हैं, तो सुकमा में बैठे साहब बीजापुर की खाक छान रहे हैं।

11 जिले पूरी तरह प्रभार की बैसाखी पर

हालात यह है कि सहायक संचालक (एडी) और उप संचालक (डीडी) लेवल के कुल 22 नियमित अधिकारी ही अपनी-अपनी कुर्सियों पर मौजूद हैं। बाकी बचे 11 जिले- कोंडागांव, सुकमा, धमतरी, महासमुंद, राजनांदगांव, बेमेतरा, गरियाबंद, गौरेला-पेंड्रा-मरवाही, कोरिया, मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर और रायगढ़ पूरी तरह खाली पड़े हैं। प्राइवेट गाड़ियों और खटारा बसों में धक्के खाने की इस मजबूरी का खमियाजा अफसरों के मूल जिलों को भी भुगतना पड़ रहा है। वहां भी कामकाज भगवान भरोसे ही चल रहा है।

किसानों की चप्पलें घिस रहीं, खेत-बीज का काम ठप

अफसरों के गायब रहने की सबसे तगड़ी मार किसानों पर पड़ रही है। खेत, बीज, पौधे और सब्सिडी के लिए किसान कार्यालय के चक्कर काट-काटकर परेशान हैं। ड्रिप-स्प्रिंकलर और शेडनेट जैसी योजनाओं में वेरिफिकेशन नहीं होने से किसानों की सब्सिडी अटक गई है। प्रभार वाले झमेले के कारण किसानों को जो फील्ड में मार्गदर्शन मिलना चाहिए, वह कोरा सपना हो गया है। विभागीय नर्सरियों और निर्माण कार्यों की रफ्तार भी कछुए जैसी हो गई है। समान तारीख पर अलग-अलग जिलों में मीटिंग होने पर अधिकारी किसी चुनिंदा जगह ही हाजिरी लगा पाते हैं, जिससे जनप्रतिनिधियों का पारा भी सातवें आसमान पर चढ़ा रहता है।

उद्यानिकी विभाग के संचालक लोकेश चंद्राकर का  कहना है कि सूबे के प्रदेश के 22 जिलों में नियमित अधिकारी हैं, बाकी जगहों पर एडिशनल प्रभार के जरिए कामकाज निबटाया जा रहा है। सात-आठ अफसरों की डीपीसी फिलहाल रुकी हुई है, जिसके पूरे होते ही खाली जिलों में परमानेंट पोस्टिंग कर दी जाएगी। किसानों और योजनाओं के काम में कोई रुकावट न आए, इसके लिए प्रमोशन प्रक्रिया पूरी होने से पहले योग्य अधिकारियों को जिलों की जिम्मेदारी सौंपने की तैयारी चल रही है।