
रायपुर। राजधानी रायपुर को साफ-सुथरा और व्यवस्थित शहर बनाने के लिए नगर निगम की ओर से समय-समय पर पोस्टर, फ्लैक्स और होर्डिंग को लेकर नियम बनाए जाते हैं। शहर के प्रमुख मार्गों को ‘नो फ्लैक्स जोन’ घोषित किया गया है और बिना अनुमति या निर्धारित मापदंडों के प्रचार सामग्री लगाने पर कार्रवाई और जुर्माने का प्रावधान भी है। लेकिन जमीनी तस्वीर इन नियमों से अलग नजर आ रही है।
शहर के कई प्रमुख मार्गों पर बिजली के खंभों, सरकारी परिसरों, सड़क किनारे की संरचनाओं और व्यावसायिक इमारतों पर बड़े-बड़े फ्लैक्स और बैनर लटके दिखाई दे रहे हैं। इनमें राजनीतिक नेताओं के जन्मदिन और बधाई संदेश, धार्मिक-सामाजिक कार्यक्रमों के प्रचार, व्यावसायिक विज्ञापन और विभिन्न आयोजनों से जुड़े पोस्टर शामिल हैं। सवाल यह है कि जब कुछ मार्गों पर फ्लैक्स लगाने पर स्पष्ट प्रतिबंध है, तो वहां लगातार नए बैनर कैसे लग रहे हैं और उन्हें हटाने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
छह प्रमुख मार्ग घोषित हैं ‘नो फ्लैक्स जोन’
नगर निगम की आउटडोर एडवरटाइजमेंट पॉलिसी के तहत शहर में सार्वजनिक स्थानों पर विज्ञापन और प्रचार सामग्री लगाने के लिए नियम निर्धारित किए गए हैं। बिना अनुमति, शुल्क या निर्धारित मापदंडों के विपरीत पोस्टर-बैनर लगाने पर कार्रवाई और जुर्माने का प्रावधान है। नगर निगम के 10 जोनों में पोस्टर और बैनर लगाने के लिए निर्धारित स्थान भी चिन्हित किए गए हैं। इसके अलावा शहर के कई प्रमुख मार्गों को नो फ्लैक्स जोन के तौर पर चिन्हित किया गया है।
इनमें महिला थाना से बूढ़ेश्वर मंदिर, तेलीबांधा थाना चौक से टाटीबंध, कोतवाली से जयस्तंभ चौक, सिविल लाइन और पचपेड़ी नाका से लालपुर ओवरब्रिज जैसे प्रमुख मार्ग शामिल बताए गए हैं। हालांकि कुछ स्थानों पर सरकारी कार्यक्रमों से संबंधित फ्लैक्स को नियमों के तहत छूट दिए जाने की बात भी सामने आती है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि प्रतिबंधित मार्गों पर निजी, राजनीतिक और व्यावसायिक प्रचार सामग्री किस अनुमति के आधार पर लग रही है?
नो फ्लैक्स रूट पर ही नजर आए बैनर
जमीनी स्थिति का जायजा लेने पर कई जगह ऐसे पोस्टर और फ्लैक्स नजर आते हैं, जो निगम की नो फ्लैक्स व्यवस्था पर सवाल खड़े करते हैं। महिला थाना से बूढ़ेश्वर मंदिर की ओर जाने वाले मार्ग पर बिजली के खंभों में कवि सम्मेलन से संबंधित फ्लैक्स और ज्वेलर्स के व्यावसायिक विज्ञापन दिखाई देते हैं। इसी तरह भगत सिंह चौक से टाटीबंध की ओर जाने वाले मार्ग पर नुआखाई, भागवत कथा, इंडिया इंडस्ट्रियल फेयर और फिल्मों के प्रचार से जुड़े पोस्टर-बैनर लगे दिखाई देने की बात सामने आई है। यदि ये प्रचार सामग्री बिना अनुमति लगाई गई है तो सवाल यह है कि इन्हें लगाने वालों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और यदि इनके लिए अनुमति ली गई है, तो क्या यह अनुमति नो फ्लैक्स जोन के नियमों के अनुरूप है?
सड़क के बीच सरकारी फ्लैक्स, विजिबिलिटी को लेकर सवाल
रायपुर में कुछ जगहों पर सरकारी कार्यक्रमों और विभागीय प्रचार से जुड़े फ्लैक्स भी सड़क के आसपास और बीच के हिस्सों में दिखाई दे रहे हैं। आकाशवाणी चौक से खजाना चौक के बीच संस्कृति विभाग से संबंधित फ्लैक्स लगाए जाने की बात सामने आई है। ऐसे स्थानों पर लगाए गए बड़े फ्लैक्स वाहन चालकों की नजर और सड़क की विजिबिलिटी को प्रभावित कर सकते हैं। खासकर व्यस्त चौराहों और मोड़ वाले हिस्सों में यदि प्रचार सामग्री चालक की दृष्टि के सामने आती है तो सड़क सुरक्षा का सवाल भी जुड़ जाता है।
सरकारी फ्लैक्स को नियमों के तहत छूट है या नहीं, यह संबंधित अनुमति और स्थान के आधार पर तय होगा। लेकिन सड़क के ऐसे हिस्सों में प्रचार सामग्री लगाने से पहले यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि उससे यातायात व्यवस्था या वाहन चालकों की सुरक्षा प्रभावित न हो।
खंभों पर झूलते फ्लैक्स, हादसे का खतरा
मेकाहारा अस्पताल से भाजपा कार्यालय की ओर जाने वाले मार्ग पर भी नेताओं के जन्मदिन और बधाई संदेश वाले फ्लैक्स खंभों और सड़क किनारे लगे दिखाई देने की बात सामने आई है। इनमें कुछ फ्लैक्स एक तरफ झुके हुए हैं और कुछ ढीले तरीके से लटके नजर आते हैं। बारिश और तेज हवा के मौसम में ऐसे फ्लैक्स और बैनर के फटने या गिरने का खतरा बढ़ सकता है। यदि कोई बड़ा फ्लैक्स सड़क पर गिरता है तो इससे यातायात बाधित होने के साथ-साथ दोपहिया और चारपहिया वाहन चालकों के लिए खतरा पैदा हो सकता है। यही वजह है कि फ्लैक्स का मुद्दा केवल शहर की खूबसूरती या अवैध विज्ञापन तक सीमित नहीं है। यह सीधे तौर पर सड़क सुरक्षा और सार्वजनिक स्थानों के सुरक्षित इस्तेमाल से जुड़ा विषय भी बन जाता है।
MG Road पर भी बैनरों की भरमार
शहर के प्रमुख व्यावसायिक इलाकों में शामिल MG Road पर भी विभिन्न कार्यक्रमों, गणेश चतुर्थी और राजनीतिक बधाई संदेशों से जुड़े पोस्टर और फ्लैक्स दिखाई देने की बात सामने आई है। एक व्यावसायिक इमारत पर करीब 10×20 फीट का बड़ा बधाई बैनर लगाए जाने का उल्लेख भी सामने आया है। इतने बड़े आकार के बैनर को यदि उचित तरीके से सुरक्षित नहीं किया गया हो तो तेज हवा या बारिश में इसके क्षतिग्रस्त होकर सड़क पर गिरने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में सवाल उठता है कि बड़े आकार के बैनर लगाने की अनुमति किन शर्तों पर दी जाती है? क्या इनकी नियमित जांच होती है? और यदि कोई बैनर निर्धारित नियमों के खिलाफ है तो उसे हटाने की कार्रवाई कितनी जल्दी की जाती है?
'नो फ्लैक्स जोन' के बावजूद निगरानी पर सवाल
नगर निगम द्वारा किसी मार्ग को नो फ्लैक्स जोन घोषित करना अपने आप में तभी प्रभावी माना जा सकता है, जब उस नियम का जमीन पर भी पालन हो। अगर प्रतिबंधित मार्गों पर लगातार नए फ्लैक्स दिखाई दे रहे हैं तो इससे निगरानी और प्रवर्तन व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है। क्या निगम की टीम इन प्रमुख मार्गों का नियमित निरीक्षण करती है? क्या किसी कर्मचारी या अधिकारी की जिम्मेदारी तय है? यदि है तो प्रतिबंधित सामग्री हटाने में देरी क्यों होती है? सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि निगम की ओर से अब तक कितने फ्लैक्स हटाए गए, कितने लोगों पर जुर्माना लगाया गया और कितने मामलों में संबंधित एजेंसी या विज्ञापनदाता के खिलाफ कार्रवाई हुई, इसका सार्वजनिक आंकड़ा क्या है?
नेता प्रतिपक्ष आकाश तिवारी ने कार्रवाई पर उठाए सवाल
नगर निगम की कार्रवाई को लेकर नेता प्रतिपक्ष आकाश तिवारी ने भी सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि निगम की कार्रवाई में समानता नहीं दिखाई देती।उनका कहना है कि छोटे दुकानदारों या व्यापारियों द्वारा दुकान के सामने पोस्टर लगाने पर कार्रवाई कर दी जाती है, लेकिन शहर के प्रमुख और प्रतिबंधित मार्गों पर बड़ी संख्या में लगे फ्लैक्स-बैनर के खिलाफ उसी तरह की सख्ती दिखाई नहीं देती। आकाश तिवारी ने यह भी कहा कि लटकते पोस्टर और बैनर केवल अव्यवस्था नहीं पैदा करते, बल्कि इनसे पहले भी दुर्घटनाओं का खतरा सामने आता रहा है। उनका कहना है कि निगम को औपचारिक अभियान चलाने के बजाय जिम्मेदारी तय कर स्थायी समाधान की दिशा में काम करना चाहिए। हालांकि नेता प्रतिपक्ष के इन आरोपों पर संबंधित मामलों में निगम की कार्रवाई और रिकॉर्ड की स्थिति अलग से स्पष्ट होना जरूरी है।
निगम का दावा- अवैध फ्लैक्स के खिलाफ कार्रवाई जारी
दूसरी ओर नगर निगम की ओर से कहा गया है कि अवैध फ्लैक्स और पोस्टर के खिलाफ कार्रवाई लगातार जारी है। निगम का कहना है कि संबंधित लोगों तक पहुंचकर कार्रवाई की जा रही है और नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं। निगम की ओर से फ्लैक्स और पोस्टर प्रिंटर्स की बैठक आयोजित करने की भी बात कही गई है। इसके साथ ही फ्लैक्स पर संबंधित प्रिंटर और अन्य जरूरी जानकारी अंकित करने को अनिवार्य किए जाने की दिशा में कदम उठाने की बात कही गई है। इस व्यवस्था का उद्देश्य यह पता लगाना हो सकता है कि नियमों का उल्लंघन करने वाला फ्लैक्स किसने छापा और किसके लिए तैयार किया गया। इससे केवल लगाने वाले व्यक्ति ही नहीं, बल्कि प्रचार सामग्री तैयार करने वाली एजेंसी तक जिम्मेदारी तय करने में मदद मिल सकती है।
सिर्फ फ्लैक्स हटाना काफी या जिम्मेदारी तय करना जरूरी?
शहर में अवैध पोस्टर-बैनर हटाने की कार्रवाई कई बार अभियान तक सीमित रह जाती है। कुछ दिन बाद उसी स्थान पर दोबारा नए फ्लैक्स दिखाई देने लगते हैं। ऐसे में सवाल केवल फ्लैक्स हटाने का नहीं, बल्कि दोबारा फ्लैक्स लगाने की प्रवृत्ति रोकने का भी है। इसके लिए अनुमति प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने, प्रतिबंधित स्थानों की नियमित निगरानी, उल्लंघन करने वालों पर जुर्माना, बार-बार नियम तोड़ने वालों पर सख्त कार्रवाई और फ्लैक्स प्रिंटर की पहचान जैसी व्यवस्थाएं प्रभावी हो सकती हैं। किसी राजनीतिक, व्यावसायिक या सामाजिक संगठन को प्रचार करना है तो उसके लिए निर्धारित स्थान और वैध अनुमति की व्यवस्था का इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे सार्वजनिक स्थानों पर मनमाने ढंग से फ्लैक्स लगाने की समस्या कम की जा सकती है।
हादसा हुआ तो जिम्मेदारी किसकी होगी?
फ्लैक्स और बैनर को लेकर सबसे गंभीर सवाल सड़क सुरक्षा का है। यदि कोई बड़ा बैनर तेज हवा में गिरता है, बिजली के तारों से टकराता है या किसी वाहन चालक की विजिबिलिटी प्रभावित होने के कारण दुर्घटना होती है, तो जिम्मेदारी किसकी होगी? किसी दुर्घटना के बाद जिम्मेदारी तय करने के बजाय बेहतर है कि संभावित खतरे को पहले ही हटाया जाए। खासकर अस्पतालों, प्रमुख चौराहों, व्यस्त बाजारों, ओवरब्रिज और ट्रैफिक वाले मार्गों पर ऐसे फ्लैक्स की नियमित निगरानी जरूरी है।
कागज से जमीन तक कब पहुंचेगा 'नो फ्लैक्स जोन'?
रायपुर में नो फ्लैक्स जोन की व्यवस्था का उद्देश्य शहर को अनधिकृत विज्ञापन सामग्री से मुक्त रखना और प्रमुख मार्गों की दृश्यता एवं यातायात सुरक्षा बनाए रखना है। लेकिन यदि प्रतिबंधित मार्गों पर ही लगातार फ्लैक्स और बैनर नजर आते रहें तो नियमों के प्रभावी क्रियान्वयन पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
अब जरूरत केवल नए फ्लैक्स हटाने की नहीं, बल्कि यह पता लगाने की है कि वे वहां तक कैसे पहुंचे? किसने लगाए, किसकी अनुमति थी, किसने निगरानी की और नियम तोड़ने पर क्या कार्रवाई हुई, इन सवालों के जवाब सामने आने चाहिए। नो फ्लैक्स जोन सिर्फ सरकारी रिकॉर्ड या आदेश की फाइल में नहीं, बल्कि रायपुर की सड़कों पर भी दिखाई देना चाहिए। यही व्यवस्था शहर की सुंदरता के साथ-साथ नागरिकों की सुरक्षा के लिए भी जरूरी है।