
रायपुर। राज्य के सरकारी विभागों में अधिकारियों की पदोन्नति को लेकर बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है। मामला दुर्ग जिले में तैनात अधीक्षण अभियंता और भूपेश बघेल के करीबी माने जाने वाले आशुतोष सारस्वत का है। आरोप है कि उच्च पद बैठने इस अधिकारी द्वारा पुरानी वार्षिक गोपनीय प्रतिवेदन (सीआर) के मूल्यांकन में नियमों को दरकिनार करते हुए बदलाव करवा लिया गया। गड़बड़ी के सामने आने के बाद पूरे जल संसाधन विभाग में हड़कंप मचा हुआ है। अब जल संसाधन विभाग की कार्यप्रणाली पर उंगलियां उठ रही हैं अब सवाल उठ रहा है कि आखिर इतनी बड़ी चूक कैसे और किसकी शह पर हुई। इस खुलासे के बाद दुर्ग से लेकर रायपुर तक विभागीय गलियारो में चर्चा जोरों पर है
डीपीसी के दस्तावेजों ने खोली पोल
इस पूरी गड़बड़ी की परतें अधीक्षण अभियंता श्री सारस्वत की पुरानी और नई विभागीय पदोन्नति समिति (डीपीसी) के दस्तावेजों को खंगालने पर उधड़ीं। वर्ष 2022 में जब आशुतोष सारस्वत को सहायक अभियंता से प्रमोट कर कार्यपालन अभियंता बनाया गया था, तब उनकी फाइलों का बारीकी से परीक्षण हुआ था। उस समय तैयार किए गए ग्रेडिंग चार्ट के मुताबिक, मार्च 2021 और मार्च 2022 की सीआर को 'क' श्रेणी में रखा गया था। इसी मूल्यांकन के आधार पर वर्ष 2023 में उन्हें कार्यपालन अभियंता का पदभार दे दिया गया। उस वक्त तक दस्तावेजों में कोई भी विसंगति नजर नहीं आयी थी।
बंद फाइलों में बदल गई ग्रेडिंग
कथित तौर पर असली गड़बड़झाला वर्ष 2026 में हुआ। जब कार्यपालन अभियंता से अधीक्षण अभियंता के पद पर प्रमोशन के लिए फिर से नई डीपीसी बैठी, तो उन्हीं पुराने वर्षों की सीआर अपग्रेड हो गई। नई डीपीसी की रिपोर्ट में साल 2022 और 2023 की सीआर का मूल्यांकन अचानक 'क प्लस' दर्ज कर लिया गया। पुरानी फाइलों में दर्ज ग्रेडिंग का इस तरह से बदल जाना कई तरह के संदेह पैदा कर रहा है।
नियमों की उड़ी धज्जियां
विभागीय नियमों के मुताबिक, जो सीआर पहले ही लिखी जाकर लॉक हो चुकी होती है और जिसके आधार पर पूर्व में पदोन्नति दी जा चुकी होती है, उसमें बाद में किसी भी तरह का संशोधन मान्य नहीं होता। इसके बावजूद ग्रेडिंग का 'क' से 'क प्लस' हो जाना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा नहीं माना जा सकता। जिन दस्तावेजों का परीक्षण पूर्व की कमेटी कर चुकी थी, नई कमेटी के सामने वे दस्तावेज बदले हुए स्वरूप में कैसे पहुंच गए, यह बड़ा रहस्य बना हुआ है।