रायपुर। छत्तीसगढ़ और ओडिशा राज्य के बीच महानदी के जल बंटवारे को लेकर बीते 9 वर्षों से विवाद आज भी जारी है। इसके विवाद से निपटने के लिए सरकार द्वारा महानदी जल विवाद अभिकरण (ट्रिब्यूनल) का गठन किया गया है । जिसकी जिम्मेदारी सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त जस्टिस बेला त्रिवेदी के पास है। इस मामले में राज्य शासन का पक्ष रखने के नाम पर पिछले कुछ वर्षों में लगभग 75 करोड़ रुपए की भारी-भरकम राशि पानी की तरह बहा दी गई । मगर करोड़ों रुपए खर्च करने के बाद आज भी केस की प्रगति शून्य है।

 

इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि 75 करोड़ रुपए में से ट्रिब्यूनल के समक्ष पेशी के लिए वकीलों को मात्र 7 करोड़ रुपए का ही भुगतान किया गया। बाकी बचे लगभग 68 करोड़ रुपए का विभागीय अधिकारियों ने वकीलों से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और व्यक्तिगत चर्चा का फर्जी हवाला देकर आपस में 'बंदरबांट' कर दिया। चर्चा और बैठकों की आड़ में सरकारी खजाने की इतनी बड़ी रकम को ठिकाने लगाना विभागीय इंजीनियरों और अफसरों की मिलीभगत को उजागर करता है।

महानदी जल विवाद पर छत्तीसगढ़ की ओर से ट्रिब्यूनल को जानकारी और तथ्य देने का जिम्मा जिन अधिकारियों पर है, उनका कामकाज पूरी तरह से निराशाजनक रहा है। जल संसाधन विभाग ने इस काम के लिए सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता आरके नगरिया (सेवानिवृत्ति: 30 अप्रैल 2023), आरएस नायडू (सेवानिवृत्ति: 31 दिसंबर 2021) और कार्यपालन अभियंता जयंत कुमार बिसेन को नियुक्त किया है। 9 साल तक बेवजह दौड़-धूप करने और करोड़ों रुपए ठिकाने लगाने के बाद भी कुछ हासिल न होना नगरिया, बिसेन आदि का इस मामले पर बेरुखापन दर्शाता है।

 

विभागीय कार्यालय में बैठे इन रिटायर अफसरों की सैलरी और भत्ते भी काफी ज्यादा हैं। आरएस नायडू जनवरी 2022 और आरके नगरिया मई 2023 से विभाग से लगातार भुगतान उठा रहे हैं। ये अधिकारी अपनी नियमित पेंशन तो ले ही रहे हैं, साथ ही इन्हें हर महीने डेढ़ लाख रुपए का वेतन अलग से दिया जा रहा है। इसमें भी नया तथ्य यह सामने आया है कि आरएस नायडू को पेंशन और डेढ़ लाख रुपए वेतन के अलावा काम के नाम पर घंटे के हिसाब से भी भारी-भरकम पैसे दिए जा रहे हैं।

दूसरी तरफ, नगरिया राज्य सरकार की तमाम सुख-सुविधाओं का पूरा उपयोग कर रहे हैं। उन्हें शासन की ओर से वाहन, ड्राइवर, डीजल-पेट्रोल और हवाई टिकट जैसी सुविधाएं मिल रही हैं। यदि इन अफसरों के ऊपर हो रहे कुल व्यय को जोड़ दिया जाए तो राज्य शासन पर यह राशि और भी बढ़ जावेगी।

हर महीने भारी-भरकम वेतन, घंटे के हिसाब से पैसा और सरकारी सुविधाएं लेने के बावजूद ये अफसर ट्रिब्यूनल को सटीक जानकारी देने में नाकाम रहे हैं। मुख्य अभियंता आरके नगरिया की कार्यप्रणाली पहले भी विवादित रही है। बोधघाट परियोजना के सर्वेक्षण कार्य में इन्होंने ही ठेकेदार को करीब 13 करोड़ रुपए का भुगतान किया था। इतनी बड़ी रकम चुकाने के बाद भी उस परियोजना में आज तक कोई प्रगति नहीं हुई, जो 13 करोड़ का पूरी तरह से निष्फल व्यय साबित हुआ। इसी अधिकारी ने सर्वेक्षण के नाम पर 44 करोड़ रुपए का फर्जी प्राक्कलन तैयार करवाकर उसे तकनीकी स्वीकृति दी थी।