
रायपुर। सत्ता की मलाई और बड़े पदों की चाहत में अपनी मूल पार्टी छोड़कर भाजपा का दुपट्टा ओढ़ने वाले नेताओं की हालत अब ‘ना घर के, ना घाट के’ जैसी हो गई है। विधानसभा चुनाव के बाद सत्ता परिवर्तन के लगभग ढाई साल बीतने पर ये दलबदलू नेता उपेक्षा का शिकार बनकर रह गए हैं।
वरिष्ठ पत्रकार कौशल तिवारी के अनुसार, भूपेश बघेल सरकार की विदाई के बाद कांग्रेस और अन्य दलों के नेताओं-कार्यकर्ताओं का भाजपा में प्रवेश का मेला सा लग गया था। भाजपा ने दावा किया था कि 10 हजार से अधिक नेताओं और कार्यकर्ताओं ने पार्टी में निष्ठा जताई है। लेकिन आज स्थिति यह है कि ‘यूज एंड थ्रो’ की राजनीति के तहत इनमें से अधिकांश को किनारे कर दिया गया है।
किस्मत सिर्फ एक की चमकी, बाकी को मिला झुनझुना
इस पूरे दलबदल के खेल में किस्मत सिर्फ चिंतामणि महाराज की चमकी। कांग्रेस छोड़ते ही उन्हें सरगुजा लोकसभा सीट का टिकट मिला और वे जीतकर दिल्ली पहुंच गए। उनके अलावा बाकी दिग्गज नेताओं के हाथ खाली हैं।
चंद्रशेखर शुक्ला को 350 सदस्यों वाली जंबो कार्यकारिणी में महज एक जगह मिली। चोलेश्वर चंद्राकर समेत कई नेताओं को प्रभारी या आमंत्रित सदस्य बनाकर टहला दिया गया है। कोई भी बड़ा नेता सिर्फ ‘दरी बिछाने’ या कार्यकारिणी का कागज जेब में लेकर घूमने के लिए पार्टी नहीं बदलता। पावर, पद, प्रतिष्ठा और गाड़ी की उम्मीद में भाजपा का दामन थामने वाले इन नेताओं में अब भारी छटपटाहट है।
हाशिये पर धकेले गए बड़े चेहरे
निगम, मंडल और आयोगों में लाल बत्ती की उम्मीद लगाए बैठे पूर्व विधायकों, पूर्व महापौरों और प्रदेश स्तरीय पदाधिकारियों की लंबी फेहरिस्त अब उपेक्षा का शिकार है। इनमें प्रमुख नाम हैं:
- प्रमोद शर्मा (पूर्व विधायक, बलौदाबाजार)
- सफीरा साहू (पूर्व महापौर, जगदलपुर)
- चुन्नीलाल साहू, विधान मिश्रा, शिशुपाल सूरी (पूर्व विधायक)
- अरुण चौहान (पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष)
- शीला तिवारी (पूर्व महिला कांग्रेस अध्यक्ष, बस्तर)
- अनीता रावटे (पूर्व प्रदेश महिला कांग्रेस अध्यक्ष)
- सीमा बघेल (पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की भाभी)
- कमल झा (पूर्व अध्यक्ष, महिला कांग्रेस जगदलपुर)
- यशवर्धन राव (पूर्व नेता प्रतिपक्ष, जगदलपुर)
- महेश देवांगन (दिवंगत जोगी जी के करीबी)
शादी-ब्याह के उपेक्षित मेहमानों की तरह इन नेताओं को पार्टी की बैठकों में बुला तो लिया जाता है, लेकिन नीतिगत फैसलों में इनकी कोई राय नहीं ली जाती।
कैडर का दबाव और अंदरूनी अंतर्द्वंद्व
भाजपा द्वारा बाहरी नेताओं को दरकिनार करने के पीछे पार्टी के मूल कैडर का भारी विरोध मुख्य वजह माना जा रहा है। सालों से पार्टी का झंडा उठाने और दरी बिछाने वाले निष्ठावान कार्यकर्ताओं ने साफ चेतावनी दे रखी है कि सत्ता मिलने पर निगम-मंडलों के मलाईदार पद बाहर से आए लोगों को दिए गए तो कड़ा विरोध होगा।
इसके साथ ही भाजपा के भीतर भी गहरा अंतर्द्वंद्व चल रहा है। विधायकों और मंत्रियों में असंतोष की खबरें सामने आ रही हैं, जिसके कारण डैमेज कंट्रोल की कोशिशें जारी हैं। फिलहाल विचारधारा छोड़कर सिर्फ सत्ता के पीछे भागने वाले दलबदलू नेताओं का भविष्य छत्तीसगढ़ की राजनीति में अनिश्चितता के भंवर में फंसा नजर आ रहा है।