
रायपुर। छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉर्पोरेशन लिमिटेड यानी सीजीएमएससी में इन दिनों एक टेंडर को लेकर भारी हड़कंप मचा हुआ है। छत्तीसगढ़ के विभिन्न मेडिकल कॉलेजों के लिए फर्नीचर खरीदी का यह मामला अब एक बड़े विभागीय घोटाले और प्रक्रियात्मक लापरवाही की ओर इशारा कर रहा है। आरोप है कि अधिकारियों ने चहेते ठेकेदारों को लाभ पहुंचाने और अपनी घोर प्रशासनिक सुस्ती के चलते एक ऐसा टेंडर जारी किया है जिसमें कुर्सियों और मेज जैसे सामान्य फर्नीचर की सप्लाई के लिए मेडिकल उपकरणों के अंतरराष्ट्रीय मानकों की मांग की गई है। इस गंभीर विसंगति को लेकर आरटीआई कार्यकर्ता और विश्लेषक मनीषंकर पाण्डेय ने सीधे प्रदेश के मुख्य सचिव विकास शील को एक विस्तृत और तथ्यात्मक शिकायत भेजी है जिसमें टेंडर प्रक्रिया की धज्जियां उड़ने का पूरा कच्चा चिट्ठा खोला गया है।
मनीशंकर पाण्डेय की शिकायत के अनुसार यह पूरा मामला निविदा क्रमांक 268 ईक्यूपी सीजीएमएससी 2026 और 2027 से जुड़ा है जो 30 अप्रैल 2026 को जारी किया गया था। इस निविदा के जरिए कबीरधाम, मनेन्द्रागढ़, जांजगीर चांपा, दंतेवाड़ा और कुंकुरी जशपुर के नव निर्मित मेडिकल कॉलेजों के लिए बड़े पैमाने पर फर्नीचर खरीदा जाना है। एक खोजी नजरिए से देखा जाए तो यह टेंडर भ्रष्टाचार और कॉपी पेस्ट कार्यप्रणाली का एक बेजोड़ नमूना लगता है। निविदा के दस्तावेजों में स्पष्ट रूप से सीडीएससीओ लाइसेंस, यूएसएफडीए प्रमाणपत्र, डब्ल्यूएचओ जीएमपी प्रमाणन, मेडिकल डिवाइस रूल्स 2017, एईआरबी अनुमति और सीपीसीबी अनुमति जैसी जटिल शर्तें थोप दी गई हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि लकड़ी या लोहे की कुर्सियों, मेज और बिस्तरों के लिए रेडिएशन नियंत्रण बोर्ड या अमेरिकी स्वास्थ्य एजेंसी के प्रमाण पत्र की क्या आवश्यकता है। यह साफ दर्शाता है कि विभाग ने बिना किसी तकनीकी परीक्षण के किसी पुरानी एक्स रे या एमआरआई मशीन वाली मेडिकल उपकरण निविदा को ज्यों का त्यों कॉपी करके फर्नीचर खरीदी के लिए चस्पा कर दिया है।
इस टेंडर की शर्तों का गहराई से विश्लेषण करने पर कई नियमों के खुले उल्लंघन सामने आते हैं। मनीषंकर पाण्डेय ने अपने प्रतिवेदन में भारत सरकार के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय द्वारा जारी फर्नीचर क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर 2025 का प्रमुखता से हवाला दिया है। इस आदेश के तहत वर्क चेयर के लिए आईएस 17631, जनरल पर्पज चेयर के लिए आईएस 17632, मेज के लिए आईएस 17633, स्टोरेज यूनिट के लिए आईएस 17634 और बिस्तरों के लिए आईएस 17635 जैसे भारतीय मानकों का पालन और उनका बीआईएस प्रमाणन अनिवार्य है। लेकिन सीजीएमएससी के टेंडर में गुणवत्ता नियंत्रण के इस सबसे अहम राष्ट्रीय नियम को ही दरकिनार कर दिया गया है। बीआईएस प्रमाणित उत्पादों की अनिवार्यता न होने से यह आशंका प्रबल हो गई है कि भविष्य में मेडिकल कॉलेजों को घटिया और गैर मानक फर्नीचर थमा दिया जाएगा जिससे मरीजों और छात्रों की सुरक्षा के साथ साथ सरकारी खजाने को करोड़ों का चूना लगेगा।
नियमों की अनदेखी का सिलसिला यहीं नहीं रुकता। छत्तीसगढ़ स्टोर परचेज नियम के नियम 4.2 उपनियम 2 में स्थानीय एमएसएमई और स्टार्टअप्स को टर्नओवर और अनुभव में छूट देने का स्पष्ट प्रावधान है। राज्य सरकार की नीतियां स्थानीय उद्योगों को बढ़ावा देने की बात करती हैं लेकिन इस निविदा में 20 करोड़ रुपये का भारी भरकम औसत वार्षिक टर्नओवर और वह भी विशेष रूप से मेडिकल उपकरणों की आपूर्ति के अनुभव के साथ मांग लिया गया है। यह अजीबोगरीब शर्त राज्य के वास्तविक फर्नीचर निर्माताओं और छोटे उद्यमियों को प्रतिस्पर्धा से पूरी तरह बाहर करने की एक सुनियोजित साजिश प्रतीत होती है। इसके अलावा संपूर्ण बीओक्यू यानी सभी वस्तुओं की दर एक साथ अनिवार्य रूप से भरने की शर्त भी डाली गई है। इससे कोई भी श्रेणी विशेष का फर्नीचर निर्माता टेंडर में भाग नहीं ले पाएगा और इसका सीधा फायदा केवल बड़े कॉरपोरेट या सप्लायर सिंडिकेट को मिलेगा जो हर तरह का सामान आउटसोर्स करके सप्लाई करते हैं।
स्टोर परचेज नियमों के तहत यदि कोई सामग्री जेम पोर्टल पर उपलब्ध है तो उसकी खरीदी सामान्यतः उसी माध्यम से होनी चाहिए। ओपन टेंडर जारी करने से पहले क्या नियमानुसार जेम पोर्टल पर उपलब्धता की जांच की गई और वित्तीय सहमतियां ली गईं, यह भी जांच का एक बड़ा विषय है। तकनीकी विनिर्देश तय करने के मामले में भी नियम 4.1 का घोर उल्लंघन हुआ है क्योंकि एर्गोनॉमिक्स, लोड बेयरिंग क्षमता, कोटिंग और सामग्री की गुणवत्ता जैसे फर्नीचर विशिष्ट तकनीकी मापदंडों का टेंडर में कहीं कोई अता पता नहीं है।
मनीशंकर पाण्डेय ने मुख्य सचिव से मांग की है कि इस पूरे टेंडर की तत्काल तकनीकी और विधिक समीक्षा कराई जाए। उन्होंने अप्रासंगिक शर्तों को हटाकर एमएसएमई की निष्पक्ष भागीदारी सुनिश्चित करने और जरूरत पड़ने पर निविदा को निरस्त कर नए सिरे से बीआईएस मानकों के अनुरूप जारी करने का आग्रह किया है। साथ ही टेंडर बनाने वाले गैर जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की भी मांग उठाई गई है। अब देखना यह है कि राज्य का शीर्ष प्रशासन सीजीएमएससी की इस बड़ी प्रक्रियात्मक भूल या सुनियोजित खेल पर क्या एक्शन लेता है क्योंकि यह सीधे तौर पर सार्वजनिक धन के दुरुपयोग और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा की हत्या का मामला है।