
रायपुर। छत्तीसगढ़ की सीतापुर विधानसभा सीट से कांग्रेस के दिग्गज मंत्री को हराकर इतिहास रचने वाले भाजपा विधायक रामकुमार टोप्पो अब खुद विवादों के चक्रव्यूह में फंस गए हैं। पूर्व सीआरपीएफ कमांडो से नेता बने टोप्पो की कुर्सी पर अब बड़ा खतरा मंडरा रहा है। पूरा मामला उनके आदिवासी होने और एसटी जाति प्रमाण पत्र से जुड़ा है। जिला स्तरीय छानबीन समिति ने उनका जाति प्रमाण पत्र फर्जी बताते हुए उसे निरस्त करने की सिफारिश कर दी है। लेकिन कमाल की बात है कि राजनीतिक रसूख के आगे फाइलों का वजन अचानक भारी हो गया और सिस्टम ने इस रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया। नतीजा यह है कि कार्रवाई जस की तस रुकी हुई है।
यह पूरा विवाद सीतापुर की अनुसूचित जनजाति आरक्षित सीट का है। साल 2023 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले और बाद में भाजपा के ही कार्यकर्ता और जनजाति सुरक्षा मंच के बिहारी लाल तिर्की ने विधायक के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। याचिकाकर्ता का सीधा आरोप है कि विधायक के पिता गणेश राम 1980 के आसपास एक डैम प्रोजेक्ट में काम करने के लिए बिहार से छत्तीसगढ़ के रायगढ़ आए थे। उनके परिवार के पास 1950 का वह राजस्व रिकॉर्ड ही नहीं है जो एसटी प्रमाण पत्र के लिए सबसे जरूरी होता है।
हैरानी की बात यह है कि साल 2023 में चुनाव से पहले लैलूंगा एसडीएम कार्यालय से आनन फानन में स्थायी प्रमाण पत्र बनवा लिया गया। ग्राम सभा के जिस प्रस्ताव का सहारा लिया गया उसमें जाति का स्पष्ट जिक्र तक नहीं था। हद तो तब हो गई जब ओरांव जनजाति की पारंपरिक भाषा कुड़ुख की जगह सरकारी कागजों में मातृभाषा छत्तीसगढ़ी बता दी गई। टोप्पो उपनाम को लेकर भी कई सवाल खड़े किए गए क्योंकि उनके रिश्तेदारों के नाम में यह उपनाम नहीं जुड़ता है।
शिकायत के बाद अक्टूबर 2023 में बिलासपुर हाईकोर्ट ने रायगढ़ कलेक्टर को जांच के आदेश दिए थे। जिला स्तरीय सत्यापन समिति ने जांच की और पाया कि प्रमाण पत्र वाकई फर्जी है। समिति ने इसे रद्द करने की सिफारिश भी कर दी। पर सत्ता का असर देखिए कि रिपोर्ट आने के बाद भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। आखिर प्रशासन भी तो दबाव में काम करना बखूबी जानता है। जब मामला टलता दिखा तो अप्रैल 2026 में हाईकोर्ट ने फिर सख्ती दिखाई। अदालत ने प्रशासन की सुस्ती पर नाराजगी जताते हुए 90 दिन के भीतर अंतिम फैसला लेने का कड़ा अल्टीमेटम दे दिया है।
जाति का जिन्न अभी शांत भी नहीं हुआ था कि मई 2026 में एक नया बखेड़ा खड़ा हो गया। इस बार मामला नायब तहसीलदार तुषार मानिक के साथ मारपीट का है। विधायक की एक रिश्तेदार ने तहसीलदार पर बदसलूकी और जातिसूचक टिप्पणी करने का आरोप लगाया। वहीं दूसरी तरफ तहसीलदार ने विधायक और उनके समर्थकों पर सरकारी काम में बाधा डालने और मारपीट करने की एफआईआर दर्ज करा दी। इस घटना के बाद पूरा राजस्व अमला ही हड़ताल पर चला गया। बवाल बढ़ता देख विधायक जी ने गिरफ्तारी देने का ऐलान किया पर समर्थकों की भारी भीड़ और विरोध देखकर अपना प्लान ही बदल लिया।
कभी अपनी साफ सुथरी और फौजी वाली छवि के दम पर चुनाव जीतने वाले रामकुमार टोप्पो आज गंभीर आरोपों से घिरे हैं। अगर हाईकोर्ट के आदेश के बाद फर्जी जाति प्रमाण पत्र पर अंतिम मुहर लगती है तो उनकी विधायकी जाना तय है। फिलहाल जनता यह देखने का इंतजार कर रही है कि कानून अपना काम करेगा या फिर राजनीतिक रसूख एक बार फिर सच्चाई पर भारी पड़ेगा।
धनकी (पिछड़ा वर्ग) जाति के है विधायक ?
आरोप है कि रामकुमार टोप्पो का परिवार वर्ष 1980 में बिहार से आकर रायगढ़ में बसा था। बताया जा रहा है कि इनकी मूल जाति 'धनकी' है, जो कि बिहार में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की सूची में दर्ज है। संवैधानिक नियमों के तहत, छत्तीसगढ़ में किसी भी व्यक्ति को आदिवासी वर्ग का दर्जा तभी मिल सकता है, जब वह या उसके पूर्वज अविभाजित मध्य प्रदेश (वर्तमान छत्तीसगढ़) के मूल निवासी हों। चूंकि रामकुमार टोप्पो मूल रूप से यहां के निवासी नहीं हैं और उनकी मूल जाति 'धनकी' उनके पैतृक राज्य में ओबीसी श्रेणी में आती है, इसलिए नियमों के मुताबिक उन्हें छत्तीसगढ़ में आदिवासी (एसटी) जाति में शामिल नहीं किया जा सकता। इस तथ्य के सामने आने के बाद उन्हें मिल रहे एसटी वर्ग के लाभ और उनके दर्जे की वैधता को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए