
बिलासपुर से लेकर रायपुर तक इन दिनों एक ही चर्चा है. भारतीय जनता पार्टी की एक महिला नेत्री सुष्मिता किंग ( बदला हुआ नाम) और रांची के कारोबारी संजय सिंह के बीच उलझा दैहिक शोषण और करोड़ों की धोखाधड़ी का मामला अब एक राजनीतिक सस्पेंस थ्रिलर बन चुका है. सिविल लाइन थाने में दर्ज एफआईआर और उसके बाद सामने आए एक वीडियो ने पुलिस और सियासत दोनों की नींद उड़ा दी है. इस पूरे घटनाक्रम में एक तरफ पुलिसिया कार्रवाई है तो दूसरी तरफ राजनीतिक गलियारों में पसरा सन्नाटा. बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या नेत्री सच में शिकार बनी हैं या उसका आरोप किसी गहरी और बड़ी साजिश का हिस्सा है जहां रसूख का इस्तेमाल हथियार के रूप में किया जा रहा है.
महिला नेत्री के गंभीर आरोप
महिला नेता का दावा है कि कारोबारी संजय सिंह ने माइनिंग व्यवसाय में पार्टनरशिप का झांसा देकर उनसे अलग अलग किस्तों में दो करोड़ पचास लाख रुपये ठग लिए. जब उन्होंने अपने पैसे वापस मांगे तो कारोबारी ने उनके साथ दुष्कर्म किया और आपत्तिजनक तस्वीरों के जरिए ब्लैकमेलिंग शुरू कर दी. बता दें कि महिला नेत्री की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं काफी प्रबल रही हैं और वे कोटा विधानसभा से टिकट की मजबूत दावेदार भी थीं. उनका रसूख सोशल मीडिया पर उनकी सक्रियता और एनजीओ के जरिए सत्ता के शीर्ष अधिकारियों तक उनकी पहुंच इस मामले को बेहद वजनदार बनाती है. पुलिस ने मामले की नजाकत को समझते हुए तत्परता दिखाई और आरोपी को गिरफ्तार कर लिया.
कारोबारी का वीडियो सामने आने के बाद कहानी में नया मोड़
इस सस्पेंस वाली कहानी में नया मोड़ तब आता है जब कारोबारी संजय सिंह खुद सोशल मीडिया पर अपना वीडियो अपलोड करते है . उनकी गिरफ्तारी के इर्द गिर्द वायरल हुए इस वीडियो ने इस पूरी स्टोरी की दिशा को ही बदल कर रख दिया है यहां संजय सिंह ने खुद को असली पीड़ित बताया है. सिंह का दावा है कि उसने कोई ढाई करोड़ रुपये नहीं लिए बल्कि नेत्री ने ही ओडिशा और छत्तीसगढ़ में कोल माइंस के ठेके दिलाने के नाम पर उससे अस्सी लाख रुपये की वसूली की थी. इस काम के लिए बाकायदा अभिषेक सिंह अलका सिंह और तड़का देव सिंह जैसे नामों का इस्तेमाल किया गया. कारोबारी का यह बयान एकतरफा दिख रही पुलिसिया कार्रवाई और नेत्री की नीयत दोनों पर गंभीर सवाल खड़े कर देता है.
दावों की पड़ताल और उलझते सवाल
अगर दोनों पक्षों के बयानों और दर्ज एफआईआर का बारीकी से विश्लेषण किया जाए तो कई बड़े झोल नजर आते हैं. कारोबारी का दावा है कि पिछले सात महीनों से दोनों के बीच कोई आमने सामने की मुलाकात नहीं हुई थी और केवल फोन पर ही बातचीत हो रही थी. अगर सात महीने से कोई व्यक्तिगत संपर्क नहीं था तो फिर अचानक दैहिक शोषण का आरोप कैसे और किस घटना के संदर्भ में लगाया गया. यह एक ऐसा सवाल है जो नेत्री के दावों पर गहरा संदेह पैदा करता है. वहीं दूसरी तरफ अगर कारोबारी से ठेके के नाम पर अस्सी लाख की ठगी हुई थी तो उसने पुलिस में पहले ही शिकायत क्यों नहीं दर्ज कराई. क्या वह खुद किसी अवैध ठेके की सेटिंग में शामिल था इसलिए वह इतने लंबे समय तक चुपचाप अपनी रकम वापस मांगता रहा.
रसूख और पैसों का खतरनाक नेक्सस
सूत्रों की मानें तो नेत्री का पुराना एनजीओ बैकग्राउंड और करीब सात आठ वर्ष पहले से कई बड़े अधिकारियों से उनके प्रगाढ़ संपर्क इस पूरे मामले को एक अलग ही रंग दे रहे हैं. सोशल मीडिया पर उनके प्रोफाइल को खंगालने से पता चलता है कि वे प्रभावशाली लोगों के बीच अच्छी पैठ रखती हैं. यह पूरा विवाद केवल एक महिला और एक पुरुष के बीच का नहीं लग रहा बल्कि यह सत्ता ठेकेदारी और करोड़ों के लेन देन का एक ऐसा नेक्सस है जिसके तार सत्ता के गलियारों में बहुत गहरे जुड़े हैं. कारोबारी द्वारा अपनी रकम वापस मांगने पर रायपुर में हुई बातचीत और बैंक अकाउंट नंबर लेने के लिए थार गाड़ी से पहुंचे अज्ञात लोगों का जिक्र यह स्पष्ट बताता है कि इस लेन देन में कई और चेहरे भी शामिल हैं जो अभी पर्दे के पीछे छिपे हैं.
आगे की जांच में और क्या......
फिलहाल बिलासपुर पुलिस दोनों पक्षों के तकनीकी वित्तीय साक्ष्यों और कॉल डिटेल्स की बारीकी से जांच कर रही है. लेकिन जिस तरह से घटनाक्रम रोज बदल रहे हैं यह स्पष्ट है कि सच्चाई उतनी सीधी नहीं है जितनी सिविल लाइन थाने की एफआईआर में दर्ज कराई गई है. क्या नेत्री ने अपने राजनीतिक रसूख का इस्तेमाल कर अपनी देनदारी खत्म करने और कारोबारी की आवाज दबाने के लिए यह दांव चला है या फिर कारोबारी अपनी धोखाधड़ी छिपाने के लिए झूठी कहानी गढ़ रहा है. बैंक खातों के ट्रांजेक्शन और साइबर सेल की रिपोर्ट ही अब इस रहस्य से पर्दा उठा सकती है. इस हाई प्रोफाइल मामले के हर पहलू की सूक्ष्म जांच अब बेहद जरूरी है क्योंकि यह मामला सिस्टम में घुसे भ्रष्टाचार का एक ज्वलंत उदाहरण बन चुका है.