रायपुर। प्रदेश में सुशासन का दावा करने वाली सरकार की नाक के नीचे एक ऐसा कारनामा चल रहा है जो पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। 30 करोड़ रुपये से अधिक की बेनामी संपत्ति के मामले में चार साल जेल की हवा खाने वाले दागी अफसर आलोक अग्रवाल आज समृद्धि योजना के स्टेट नोडल ऑफिसर बनकर शीर्ष नेताओं के सामने धड़ल्ले से विभागीय जानकारियां पेश कर रहे हैं। जिस अफसर ने जांच एजेंसियों और कोर्ट से बचने के लिए खुद को 71 से 75 प्रतिशत तक विकलांग बताया वह आज पूरी कुशलता के साथ मलाईदार पद की जिम्मेदारियां कैसे संभाल रहा है यह एक बड़ा रहस्य बन चुका है।

 

बीमारी के नाम पर जमानत और कुर्सी का खेल

 

जल संसाधन विभाग के इस अधिकारी का विवादों से गहरा नाता है। साल 2015 में ईओडब्ल्यू और एसीबी की कार्रवाई में इस अफसर के पास अकूत काली कमाई पकड़ी गई थी। बाद में ईडी ने भी मनी लॉन्ड्रिंग का शिकंजा कसा। जब जमानत के सारे रास्ते बंद होने लगे तो सुविधाजनक विकलांगता का कार्ड खेला गया। दस्तावेजों के अनुसार साल 1991 में जो शारीरिक विकलांगता 40 प्रतिशत थी वह 1997 में 45 प्रतिशत हुई। इसके बाद 2014 में यह आंकड़ा 60 प्रतिशत पहुंच गया। कानून का फंदा कसते ही 2018 और 2021 के मेडिकल प्रमाण पत्रों में यह विकलांगता सीधे 71 से 75 प्रतिशत तक पहुंच गई। इसी फर्जीवाड़े की ढाल बनाकर माननीय न्यायालय से सहानुभूति बटोरी गई और ईडी से लेकर ईओडब्ल्यू तक के गंभीर मामलों में जमानत हासिल की गई।

 

सफेद झूठ बोलकर हथियाई बहाली

 

 

फर्जी विकलांगता का मामला तो सिर्फ एक झांकी है। इस दागी अफसर ने साल 2021 में अपनी बहाली के लिए प्रशासनिक दुस्साहस की सारी हदें पार कर दीं। तत्कालीन सरकार के दौर में प्रमुख अभियंता को एक लिखित हलफनामा दिया गया कि उनकी कभी गिरफ्तारी हुई ही नहीं है और वे कभी जेल नहीं गए हैं। इस आवेदन में 2015 के उस महाघोटाले और चार साल की जेल की सजा को पूरी तरह छिपा लिया गया। हैरत की बात यह है कि बिना किसी क्रॉस वेरिफिकेशन या पुलिस रिकॉर्ड की जांच के इस अधिकारी को बहाल कर दिया गया और प्रमोशन देकर ईएनसी ऑफिस बोधी में बैठा दिया गया।

 

सुशासन सरकार की नजरों से कैसे बचे अग्रवाल

 

आज यही दागी अफसर आलोक अग्रवाल समृद्धि योजना के स्टेट नोडल ऑफिसर बने बैठे हैं। हाल ही में प्रधानमंत्री के मार्गदर्शन वाले एम कैड कार्यक्रम के शुभारंभ की जानकारी भी उन्होंने ही दी। वे बताते हैं कि यह परियोजना अगले 6 माह में पूर्ण की जाएगी और ठेकेदार तथा जल उपभोक्ता समिति द्वारा इसका संचालन होगा। वे बड़े बड़े कार्यक्रमों में मंच संचालन करते हैं और प्रदेश के शीर्ष नेताओं को बिना किसी शारीरिक बाधा के कुशल प्रेजेंटेशन देते हैं। ऐसे में सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह है कि यदि यह अधिकारी शारीरिक और मानसिक रूप से इतना फिट है कि करोड़ों के प्रोजेक्ट संभाल सकता है तो कोर्ट में पेश किया गया वह विकलांगता प्रमाण पत्र आखिर क्या था।

मेडिकल साइंस के अनुसार 75 प्रतिशत विकलांगता शरीर की कार्यक्षमता को बुरी तरह सीमित कर देती है। यदि वह प्रमाण पत्र सही है तो मेडिकल बोर्ड ने इतने अहम पद के लिए फिटनेस कैसे दे दी। आखिर नई सुशासन सरकार की नजर इस शातिर खेल और अफसर की चालाकी पर क्यों नहीं पड़ रही है। क्या पूरा सरकारी अमला इस दागी महाघोटालेबाज के सामने नतमस्तक हो चुका है या फिर इस सफेद झूठ को जानबूझकर नजरअंदाज किया जा रहा है यह जांच का विषय है।