
रायपुर। छत्तीसगढ़ के जल संसाधन विभाग में मलाईदार कुर्सियों और प्रभार का खेल थमने का नाम नहीं ले रहा है। प्रदेश में सुशासन की सरकार होने का दावा किया जा रहा है, लेकिन विभाग के एक ताज़ा आदेश ने इन दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विवादों में रहे और 2015 में एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) तथा आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) की रडार पर आ चुके दुर्ग के अधीक्षण अभियंता (एसई) सुरेश कुमार पाण्डेय को महानदी-गोदावरी कछार, रायपुर के चीफ इंजीनियर (सीई) का अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया गया है। इस अहम कुर्सी तक उन्हें पहुंचाने के लिए विभाग ने न सिर्फ हाईकोर्ट के निर्देशों को दरकिनार किया, बल्कि सबसे वरिष्ठ एसई के दावों को भी रद्दी की टोकरी में डाल दिया।
दागी अफसर पर मेहरबान सिस्टम
जल संसाधन विभाग में सुरेश पाण्डेय का नाम कोई नया नहीं है। वर्ष 2015 में एसीबी और ईओडब्ल्यू की संयुक्त टीमों ने जब प्रदेश के 8 भ्रष्ट अधिकारियों के ठिकानों पर ताबड़तोड़ छापे मारे थे, तब सुरेश पाण्डेय (तत्कालीन कार्यपालन यंत्री, जल प्रबंध संभाग-1, रायपुर) का नाम प्रमुखता से उछला था। इस छापे में पाण्डेय के पास से करोड़ों रुपये की अनुपातहीन संपत्ति का बड़ा खुलासा हुआ था।
उस दौरान जांच एजेंसियों को भिलाई के प्रोफेसर कॉलोनी (नेहरू नगर) में उनका 2 करोड़ रुपये का 3 मंजिला आलीशान बंगला मिला था। इसके अलावा 'राधिका हाइट्स' के नाम से 13 फ्लैटों वाला एक पूरा कॉम्प्लेक्स सामने आया था, जिसकी अनुमानित कीमत ही उस वक्त साढ़े तीन करोड़ रुपये से ज्यादा आंकी गई थी। इस कॉम्प्लेक्स से उन्हें हर महीने लाखों रुपये का किराया मिलता था। इतना ही नहीं, रायपुर के देवपुरी और कमल विहार में 65 लाख रुपये की बेशकीमती जमीन के साथ-साथ स्कोडा और एक्सयूवी-500 जैसी महंगी गाड़ियां भी बरामद हुई थीं। उस समय यह कार्रवाई प्रदेश की सबसे बड़ी सुर्खियों में थी और 15 करोड़ से ज्यादा की काली कमाई उजागर हुई थी। लेकिन अब, उसी दागी अफसर को सुशासन के राज में प्रभार पर प्रभार देकर नवाजा जा रहा है, जो व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े करता है।
हाईकोर्ट और सीनियर की अनदेखी
जल संसाधन विभाग में तत्कालीन चीफ इंजीनियर सतीश कुमार टीकम 30 अप्रैल को सेवानिवृत्त हुए थे। उनके रिटायरमेंट से पहले ही महानदी-गोदावरी कछार कार्यालय में पदस्थ सबसे वरिष्ठ एसई सिल्वेस्टर मिंज ने विभाग के सचिव को पत्र लिखकर इस प्रभार पर अपनी प्रबल दावेदारी पेश की थी। मिंज ने हाईकोर्ट के दो अहम आदेशों (डब्ल्यूपीएस 3426/2026 और डब्ल्यूपीएस 2653/2026) का हवाला भी दिया था।
दरअसल, हाईकोर्ट ने हाल ही में प्रमोट हुए एसई की नई पोस्टिंग पर अंतरिम रोक लगा रखी है। साथ ही मिंज की पदोन्नति के मामले में भी कोर्ट ने 15 दिन (6 मई तक) के भीतर निर्णय लेने का स्पष्ट निर्देश शासन को दिया था। मिंज का तर्क था कि नई पोस्टिंग पर रोक है और वे सबसे सीनियर हैं, इसलिए अदालत की अवमानना से बचने के लिए उन्हें ही यह प्रभार दिया जाए।
मंत्रालय ने निकाला वैकल्पिक रास्ता
अदालती पचड़ों और स्टे से बचने के लिए विभाग के रणनीतिकारों ने एक गजब का 'बीच का रास्ता' निकाला। 6 मई की मियाद बीतने के ठीक दो दिन बाद, 8 मई 2026 को प्रमुख अभियंता (ई-इन-सी) कार्यालय से एक आदेश (क्रमांक 3317003/छ.ग./2023/9127) जारी कर दिया गया। शासन ने तकनीकी रूप से इसे 'नई पोस्टिंग' मानने से इनकार करते हुए इसे महज एक 'आंतरिक या वैकल्पिक व्यवस्था' का नाम दे दिया, ताकि कोर्ट के आदेश की काट निकाली जा सके।
इस आदेश के मुताबिक, मक्सी कुजूर के स्थान पर अब सुरेश पाण्डेय अस्थाई रूप से आगामी आदेश तक अपने वर्तमान कार्य (शिवनाथ मण्डल, दुर्ग) के साथ-साथ महानदी गोदावरी कछार के मुख्य अभियंता का अतिरिक्त कार्य भी संपादित करेंगे।
अब आगे क्या होगा
सीनियर एसई सिल्वेस्टर मिंज ने अपनी न्यायोचित मांग के लिए मुख्यमंत्री से लेकर मुख्य सचिव तक अपना मांग पत्र भेजा था, लेकिन मंत्रालय के गलियारों में बाजी उस अफसर ने मार ली जिस पर कभी भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे थे और बेनामी संपत्ति का अंबार मिला था। अब देखना दिलचस्प होगा कि सुशासन सरकार में हुए इस 'प्रभार के खेल' और कोर्ट के आदेशों के कथित उल्लंघन के खिलाफ सिल्वेस्टर मिंज क्या कानूनी कदम उठाते हैं। क्या दागी अफसर को प्रभार सौंपने की यह प्रशासनिक चाल विभाग को किसी नई कानूनी उलझन में डालेगी? मंत्रालय की निगाहें अब अगले घटनाक्रम पर टिकी हैं।