
बिलासपुर : जमीन विवाद से जुड़े एक मामले में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि तहसीलदार या अन्य राजस्व अधिकारी सिविल कोर्ट की तरह अस्थायी या स्थायी आदेश जारी नहीं कर सकते। खासकर ऐसे मामलों में, जहां विवाद जमीन के स्वामित्व और कब्जे को लेकर हो और जमीन पर पहले से पक्का मकान बना हो, आदेश जारी करने का अधिकार सक्षम सिविल कोर्ट के पास है। जस्टिस ए के प्रसाद की सिंगल बेंच ने महासमुंद तहसीलदार द्वारा निर्माण रोकने के लिए जारी आदेश को अधिकार क्षेत्र से बाहर माना और उसे निरस्त कर दिया।
मामला महासमुंद की खसरा नंबर 2052/1 और 2052/2 की जमीन से जुड़ा है। याचिकाकर्ता नीरज जैन और विकास चोपड़ा ने 27 अगस्त 2021 को पंजीकृत बिक्री विलेख के जरिए 0.131 हेक्टेयर और 0.198 हेक्टेयर जमीन खरीदी थी। इसके बाद जगदीश प्रसाद अग्रवाल ने तहसीलदार के समक्ष आवेदन देकर याचिकाकर्ताओं द्वारा किए जा रहे निर्माण को रोकने की मांग की।
तहसीलदार ने राजस्व प्रकरण दर्ज कर नोटिस जारी किया। याचिकाकर्ताओं ने आपत्ति दाखिल करते हुए कहा कि स्वामित्व और कब्जे से जुड़े विवाद में राजस्व न्यायालय को आदेश जारी करने का अधिकार नहीं है। उन्होंने यह भी बताया कि इसी जमीन को लेकर जगदीश प्रसाद अग्रवाल पहले ही सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर कर चुके हैं, जिसे 26 अप्रैल 2016 को खारिज किया जा चुका है।
हाई कोर्ट के आदेश को दरकिनार कर निर्माण रोकने का आदेश जारी
आपत्ति का समय पर निराकरण नहीं होने पर याचिकाकर्ताओं ने हाई कोर्ट का रुख किया। 4 फरवरी 2022 को हाई कोर्ट ने तहसीलदार को आपत्ति पर कानून के अनुसार फैसला लेने का निर्देश दिया। आदेश का पालन नहीं होने पर याचिकाकर्ताओं ने तहसीलदार के खिलाफ अवमानना याचिका दायर कर दी। इसके बाद 25 अप्रैल 2022 को तहसीलदार ने याचिकाकर्ताओं के खिलाफ आदेश जारी करते हुए निर्माण पर रोक लगा दी। इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई। सुनवाई के दौरान जगदीश प्रसाद अग्रवाल की ओर से बताया गया कि वह खसरा नंबर 2052/3 की 0.0680 हेक्टेयर जमीन के मालिक और कब्जाधारी हैं। उनका आरोप था कि याचिकाकर्ताओं ने अपनी जमीन की पहचान किए बिना उनकी जमीन पर भी अधिकार जताते हुए निर्माण शुरू कर दिया और पेड़ काटकर कब्जे की कोशिश की।
राजस्व अधिकारी को सिविल कोर्ट की सभी शक्तियां नहीं
हाई कोर्ट ने पुराने सिविल मुकदमे के रिकॉर्ड का भी परीक्षण किया। कोर्ट ने पाया कि संबंधित जमीन खुली कृषि भूमि नहीं थी, बल्कि वहां बाउंड्रीवाल और पक्का आवासीय मकान बना हुआ था। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामले में स्वामित्व और कब्जे का निर्धारण सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आता है। विशिष्ट अनुतोष अधिनियम की धारा 34, 37 और 39 तथा सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 39 के नियम 1 और 2 के तहत आदेश देने की शक्ति सिविल कोर्ट के पास है।
हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि राजस्व मामलों में सिविल प्रक्रिया संहिता की प्रक्रिया लागू होने का मतलब यह नहीं है कि राजस्व अधिकारियों को सिविल कोर्ट की सभी शक्तियां मिल जाती हैं। जब आदेश जारी करने की मूल शक्ति ही राजस्व अधिकारी के पास नहीं है, तो केवल सीपीसी की प्रक्रिया के आधार पर वह ऐसी शक्ति का इस्तेमाल नहीं कर सकता। कोर्ट ने माना कि तहसीलदार ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर निर्माण रोकने का आदेश दिया था। इसी आधार पर 25 अप्रैल 2022 का आदेश निरस्त कर दिया गया।