बिलासपुर : अरपा नदी में अवैध रेत उत्खनन के मामले में अदालत ने ऐसा फैसला सुनाया है, जो प्राकृतिक संसाधनों की लूट और पर्यावरण से खिलवाड़ करने वालों के लिए कड़ा संदेश माना जा रहा है। नगाई घाट से जुड़े इस मामले में आरोपी कुंवर सिंह कंवर को तीन साल के कठोर कारावास और 25 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई है। विशेष न्यायाधीश सिराजुद्दीन कुरैशी ने फैसला सुनाते हुए पर्यावरण संरक्षण की अनदेखी के दूरगामी परिणामों पर गंभीर चिंता जताई।

प्रकृति का नुकसान, भविष्य पर पड़ेगा भारी

फैसले के दौरान अदालत ने एक कहावत का उल्लेख करते हुए कहा कि ‘जब आखिरी पेड़ काट दिया जाएगा, आखिरी नदी जहरीली हो जाएगी और आखिरी मछली पकड़ ली जाएगी, तब इंसान को एहसास होगा कि पैसा खाया नहीं जा सकता। यह सिर्फ एक कहावत नहीं, बल्कि उस संकट की तस्वीर है, जिसकी ओर दुनिया लगातार बढ़ रही है। नदियों से रेत का अनियंत्रित दोहन नदी के प्राकृतिक स्वरूप, जल प्रवाह और पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचा सकता है। इसका असर केवल आज की जरूरतों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी गंभीर मुश्किलें खड़ी कर सकता है। अदालत ने पोप फ्रांसिस के उस विचार का भी हवाला दिया, जिसमें जैव विविधता का विनाश ईश्वर की रचना की अखंडता पर हमला बताया गया है।

3 साल की सजा, 25 हजार का जुर्माना भी

पूरा मामला बिलासपुर जिले के कोटा थाना क्षेत्र के अंतर्गत अरपा नदी के नगाई घाट का है। वर्ष 2025 में कुंवर सिंह कंवर के खिलाफ अवैध रेत उत्खनन और चोरी के संबंध में मामला दर्ज किया गया था। सुनवाई के बाद विशेष न्यायालय ने आरोपी को संबंधित कानूनी प्रावधानों के तहत दोषी ठहराते हुए 3 वर्ष के कठोर कारावास और 25 हजार रुपये के जुर्माने से दंडित किया। आरोपी को बीएनएस की धारा 303(2), छत्तीसगढ़ गौण खनिज नियम, 2015 के नियम 71 तथा खान एवं खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 की धाराओं 4(1), 4(1क) और 21 के तहत दोषी पाया गया।

राजस्व ही नहीं, नदी के अस्तित्व को भी  खतरा

नदी से अवैध रूप से रेत निकालने का असर सरकारी राजस्व की हानि तक सीमित नहीं है। रेत नदी की प्राकृतिक संरचना और पारिस्थितिकी का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसका अनियंत्रित उत्खनन नदी तल में बदलाव, किनारों के कटाव और जलीय जीवों के आवास पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार भूजल और नदी के प्रवाह पर भी इसका असर पड़ सकता है। ऐसे में अवैध उत्खनन के मामलों को केवल आर्थिक अपराध मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इनके पर्यावरणीय परिणाम भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। अरपा जैसी नदी के संरक्षण के लिए जरूरी है कि उत्खनन से जुड़े नियमों का पालन हो और उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कानून के मुताबिक कार्रवाई की जाए।