प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि बालिग व्यक्तियों को अपनी पसंद से शादी करने का पूरा संवैधानिक अधिकार है और इसमें पुलिस को दखल देने का कोई अधिकार नहीं है। अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस की जिम्मेदारी है, न कि वयस्कों के निजी संबंधों की जांच करना। यह टिप्पणी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों को मजबूती देने के रूप में देखी जा रही है।

मामला सहारनपुर जिले से जुड़ा है, जहां एक पिता ने अपनी बालिग बेटी के कथित अपहरण और जबरन विवाह का आरोप लगाते हुए एफआईआर दर्ज कराई थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि युवती ने अपनी मर्जी से विवाह किया था और इसके पर्याप्त प्रमाण भी पेश किए गए। इसके आधार पर कोर्ट ने एफआईआर को निरस्त कर दिया और संबंधित दंपति के जीवन में किसी भी तरह के हस्तक्षेप से पुलिस को दूर रहने का निर्देश दिया।

अदालत ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाए है। कोर्ट के अनुसार, इस मामले में अधिकतम गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज की जा सकती थी, लेकिन बिना पर्याप्त आधार के गंभीर धाराएं लगाना कानून का दुरुपयोग है। न्यायालय ने इस तरह की कार्रवाई को न केवल अनुचित बताया, बल्कि इसे नागरिकों के मौलिक अधिकारों के खिलाफ भी माना।

फैसले में यह भी स्पष्ट किया गया कि भारतीय संविधान हर बालिग नागरिक को अपने जीवन साथी का चयन करने और अपनी इच्छा से जीवन जीने की स्वतंत्रता देता है। कोर्ट ने चेतावनी दी कि ऐसे मामलों में अनावश्यक पुलिस हस्तक्षेप न केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन है, बल्कि न्यायिक प्रणाली पर भी अतिरिक्त बोझ डालता है। यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण नजीर के रूप में देखा जा रहा है।