
रायपुर। रात के 11 बजकर 52 मिनट। तारीख 27 मार्च 2026। आम तौर पर इस वक्त सरकारी दफ्तरों के बाबू तो क्या, फाइलों पर जमी धूल भी गहरी नींद में होती है। लेकिन छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा विभाग (समग्र शिक्षा) में गजब की हलचल थी। ऐसा लग रहा था मानो विभाग के किसी 'अति-कर्तव्यनिष्ठ' अधिकारी पर रातों-रात स्कूलों की दशा सुधारने का जुनून सवार हो गया हो। इसी आधी रात को जैम (GeM) पोर्टल पर 42,858 ऑफिस टेबलों की खरीदी का एक भारी-भरकम टेंडर (Bid No.: GEM/2026/B/7398617) अपलोड कर दिया गया।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस टेंडर को भरने के लिए निविदाकारों को 4 मई (यानी 38 दिन) तक का भरपूर समय दिया गया है, उसे जारी करने के लिए आधी रात का यह 'शुभ मुहूर्त' ही क्यों चुना गया?
क्या रात 12 बजे तक खुला था शिक्षा विभाग का दफ्तर?
तकनीकी रूप से देखें तो ई-टेंडरिंग सिस्टम 24 घंटे काम करता है। मशीनें नहीं थकतीं, लेकिन जब मामला करोड़ों की सरकारी खरीदी का हो, तो समय का चयन नीयत की चुगली कर ही देता है।
प्रशासनिक गलियारों में सवाल उठ रहे हैं कि क्या उस रात वाकई शिक्षा विभाग का दफ्तर खुला था? क्या सक्षम अधिकारियों ने रात 12 बजे दफ्तर खोलने की अनुमति दी थी? यदि दफ्तर बंद था, तो क्या किसी 'खास' ठेकेदार या निजी फर्म के वातानुकूलित बेडरूम से लैपटॉप खोलकर यह टेंडर जारी किया गया? व्हिसलब्लोअर नरेश गुप्ता ने इस पूरे 'मिडनाइट ऑपरेशन' पर कड़ा ऐतराज जताते हुए मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। आखिर रात के अंधेरे में ऐसा कौन सा आपातकाल आ गया था, जो अगली सुबह 11 बजे तक का इंतजार नहीं कर सकता था?
जैम पोर्टल या सरकारी खजाने का जादुई चिराग'?
छत्तीसगढ़ में जैम (GeM) पोर्टल से खरीदी का ट्रैक रिकॉर्ड किसी तिलिस्म से कम नहीं रहा है। इस पोर्टल के जरिए सरकारी विभागों ने ऐसे-ऐसे चमत्कार किए हैं, जिन्हें देखकर अर्थशास्त्रियों का भी सिर चकरा जाए:
32 हजार का जादुई जग
आदिवासी विकास विभाग ने बाजार में 400 से 1000 रुपये में मिलने वाला स्टील का जग पूरे 32,000 रुपये में खरीदा।
हवा में उड़ती एजेंसी:
जग सप्लाई करने का कॉन्ट्रैक्ट 'श्रीराम सेल्स' को मिला। जब पड़ताल हुई तो पते पर कोई एजेंसी नहीं मिली और दिया गया मोबाइल नंबर किराए की दुकान चलाने वाले का निकला।
एक लाख की टीवी:
सरगुजा में अनुसूचित जाति-जनजाति विभाग ने एक लाख रुपये से अधिक की दर पर टीवी खरीदकर खजाने को चूना लगाया।
महासमुंद और स्वास्थ्य विभाग का खेल:
उच्च शिक्षा विभाग में 1.06 करोड़ रुपये की अनियमितता और स्वास्थ्य विभाग में 75 करोड़ की महंगी दवाओं की खरीदी का विवाद अभी थमा भी नहीं है।
ई-टेंडरिंग का मकसद पारदर्शिता लाना था, न कि रात के अंधेरे में 'टेबल के नीचे' वाली व्यवस्था को डिजिटल रूप देना। समग्र शिक्षा के तहत टेबल खरीदी की यह प्रक्रिया कागजों में भले ही कितनी भी पारदर्शी क्यों न हो, लेकिन इसके जारी होने की टाइमिंग ने सरकारी सिस्टम की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है।