
कागजों में दफन हुईं 10 सिंचाई योजनाएं, अफसर भरते रहे जेब, किसानों के हिस्से आई सिर्फ धूल और कंटीली झाड़ियां
अंबिकापुर/कोरिया | सरकारी खजाने में सेंधमारी और कागजों पर विकास का मायाजाल देखना हो, तो सरगुजा संभाग के जल संसाधन विभाग से बेहतर कोई उदाहरण नहीं हो सकता। यहां के अफसरों ने किसानों के खेतों तक पानी पहुंचाने के नाम पर ऐसा खेल खेला कि योजनाएं तो फाइलों में सरपट दौड़ पड़ीं, लेकिन असल में खेतों की दरारें आज तक नहीं भरीं। सिंचाई विभाग के अधिकारियों ने बिना किसी सरकारी मंजूरी के मनमाने ढंग से 38.59 करोड़ रुपए अतिरिक्त बांट दिए। आलम यह है कि जिन 10 सिंचाई योजनाओं का मूल बजट 51.58 करोड़ था, उन पर 90.18 करोड़ रुपए फूंक दिए गए, लेकिन खेतों की प्यास नहीं बुझी।
यह पूरा भ्रष्टाचार सखेन नावा, गेजरा, उमका, चेरा, लोथा, धरमी, चिड़मिरी, सिंघोर, मैनी और कुड़मुड़ुआ जैसी 10 पुरानी सिंचाई योजनाओं में किया गया। 2007 से 2013 के बीच इन योजनाओं का ढिंढोरा पीटा गया था। दावा था कि 70 गांवों के 7000 हेक्टेयर खेतों में रबी और खरीफ की फसल लहलहाएगी। किसान बीते 13-14 साल से इसी उम्मीद में आसमान ताक रहे हैं। जब बारिश नहीं होती, तो वे इन सूखी नहरों को देखकर खुद को कोसते हैं। पानी पहुंचना तो दूर, खेतों के आसपास से गुजरने वाली इन अधूरी नहरों की जगह सिर्फ कंटीली झाड़ियां, ढही हुई दीवारें और धूल के गुबार नजर आते हैं।
सीएजी (CAG) की ऑडिट रिपोर्ट से इस पूरी लूट का पर्दाफाश हुआ है। कायदे से मूल बजट से एक भी रुपया ज्यादा खर्च करने के लिए शासन से 'पुनरीक्षित प्रशासनिक स्वीकृति' लेना अनिवार्य है। लेकिन कार्यपालन अभियंताओं ने इसकी रत्ती भर भी परवाह नहीं की। मनमाने तरीके से एस्टिमेट बदले गए, टेंडर जारी हुए और चहेते ठेकेदारों को धड़ल्ले से करोड़ों का भुगतान हो गया
फोटो कैप्शन: करोड़ों की लागत से बनी नहरों का हाल। खेतों की प्यास बुझाने के बजाय नहरें खुद खंडहर में तब्दील हो गई हैं। पानी की जगह उगीं कंटीली झाड़ियां और धूल फांकती दरारें बयां कर रही हैं भ्रष्टाचार की पूरी कहानी।
सीएजी ऑडिट के आंकड़ों के अनुसार, उमका, चेरा व लोथा जैसी योजनाओं में निर्माण के दौरान ही लागत बढ़ा दी गई। फाइलों में दावा किया गया कि नहरों की गाद निकाली जा रही है और तटबंधों को मजबूत किया जा रहा है। पर जमीनी हकीकत यह थी कि खेतों के बजाय ठेकेदारों के बैंक खातों की सिंचाई हो रही थी। पहली ही बारिश में घटिया निर्माण की पोल खुल गई और सीमेंट की दीवारें ताश के पत्तों की तरह ढह गईं। करोड़ों खर्च करने के बाद भी वन विभाग की रोक के नाम पर काम अधूरा पड़ा है। अब इन जर्जर योजनाओं को पूरा करने का बजट 100 करोड़ के पार पहुंच गया है, फिर भी गारंटी नहीं है कि किसानों को पानी मिलेगा।
हनुमान की पूंछ की तरह बढ़ रही लागत, मौन सहमति से चल रहा खेल
प्रशासनिक स्वीकृति के बाद यदि योजनाएं सालों-साल पूरी नहीं होती हैं, तो यह सीधे तौर पर गंभीर वित्तीय अनियमितता है। कायदे से स्वीकृत राशि के भीतर योजनाओं को समय पर पूरा कराने की सीधी जिम्मेदारी मुख्य अभियंता की होती है। लेकिन यहां योजनाओं की लागत हनुमान की पूंछ की तरह लगातार बढ़ती ही जा रही है। बिना मंजूरी के करोड़ों बंट गए और दोषियों पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही। इसका सीधा मतलब है कि शीर्ष स्तर से ही इस गड़बड़ी को रोकने का प्रयास नहीं हुआ और मौन सहमति से यह खेल चल रहा है।
- विजय जामनिक, रिटायर्ड कार्यपालन अभियंता
आंखों में धूल: जानिए कैसे 51 करोड़ की योजनाएं 90 करोड़ निगल गईं
अफसरों की मनमानी का यह सबसे पुख्ता सुबूत है। बिना पानी दिए ठेकेदारों पर लुटाए गए सरकारी पैसों का हिसाब कुछ यूं है:
- सखेन नावा योजना: 2007 में मंजूरी मिली। लागत तय थी 4.85 करोड़, लेकिन बिना पूछे खर्च कर दिए 8.20 करोड़ रुपए।
- लोथा और धरमी योजना: 2010 में शुरू। लागत थी 5.90 करोड़, इसे बढ़ाकर 10.12 करोड़ कर दिया गया।
- गेजरा योजना: 2008 में उम्मीद जगी। लागत 6.12 करोड़ थी, लेकिन बिल 10.45 करोड़ के फाड़े गए।
- उमका और चेरा योजना: 2011 में स्वीकृत। लागत 7.80 करोड़ थी, चुपचाप 13.10 करोड़ फूंक दिए गए।
- चिड़मिरी और सिंघोर योजना: 2009 में पास। लागत 8.40 करोड़, लेकिन खर्च कर दिए गए 14.20 करोड़।
- मैनी व कुड़मुड़ुआ योजना: 2012 का सबसे बड़ा प्रोजेक्ट। लागत 18.50 करोड़, लेकिन 34.10 करोड़ रुपए स्वाहा कर दिए गए और नहरों में सिर्फ झाड़ियां बचीं।
इन परियोजनाओं को शुरू हुए काफी समय बीत चुका है। पुरानी योजनाओं की जमीनी हकीकत की नए सिरे से पड़ताल कराई जाएगी। कुछ योजनाओं के रिवाइज्ड एस्टीमेट तैयार किए जा रहे हैं। शासन से स्वीकृति और बजट मिलता है, तो कामों को पूरा कराने का प्रयास किया जाएगा।"
रजत शिलानंद तिर्की, अधीक्षण अभियंता, सिंचाई विभाग