
बिलासपुर: छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर में भ्रष्टाचार की नींव पर खड़ी विकास की एक और इमारत बेमौसम बारिश में बह गई है। जल संसाधन विभाग द्वारा 60 करोड़ रुपए की भारी-भरकम लागत से बनाए गए पचरीघाट बराज की एप्रोच रोड महज दो महीने में ही कमीशनखोरी के आंसू रोने लगी है। कुछ मिनटों की बारिश ने विभाग के दावों और ठेकेदार की तथाकथित गुणवत्ता की पोल खोलकर रख दी है। हालात यह हैं कि सीसी सड़क की ऊपरी परत पानी में धुल गई है और गिट्टियां बाहर निकलकर राहगीरों को मुंह चिढ़ा रही हैं।
जूना बिलासपुर को चिंगराजपारा और चांटीडीह से जोड़ने के लिए इस प्रोजेक्ट के तहत यह सीसी सड़क बनाई गई थी। इसे बमुश्किल दो महीने पहले ही बड़ी वाहवाही लूटते हुए आम जनता के लिए खोला गया था। लेकिन, करोड़ों रुपए खर्च करने के बाद सड़क की यह दुर्दशा देखकर अब स्थानीय लोग सीधे तौर पर भ्रष्टाचार और कमीशन के खेल का आरोप लगा रहे हैं। बिना किसी ठोस जांच के ही अब आनन-फानन में इसकी मरम्मत के नाम पर लीपापोती की तैयारी शुरू हो गई है।
लेट-लतीफी के खेल ने बढ़ा दिए 10 करोड़
पचरीघाट बराज प्रोजेक्ट शुरू से ही विवादों और लेटलतीफी का शिकार रहा है। 2021 में इस प्रोजेक्ट की प्रारंभिक लागत 50 करोड़ रुपए तय की गई थी और इसे 2023 तक पूरा होना था। लेकिन 'अतिरिक्त काम' और 'विभागीय मंजूरियों' के नाम पर लगातार खेल चलता रहा। काम की डेडलाइन एक-दो बार नहीं, बल्कि पूरे चार बार बढ़ाई गई। नतीजा यह हुआ कि प्रोजेक्ट दो साल लेट हो गया और इसकी लागत में 10 करोड़ रुपए का सीधा इजाफा हो गया। अब 60 करोड़ फूंकने के बाद जो सड़क मिली, वह 60 दिन भी टिक नहीं पाई।
अफसरों का रटा-रटाया जवाब: क्या साहब शहर में नहीं रहते?
इस पूरे मामले में सबसे हास्यास्पद बयान जल संसाधन विभाग के कार्यपालन अभियंता (EE) मधु चंद्रा का है। उन्होंने कहा, *"एप्रोच रोड उखड़ने की शिकायत मिली है। जांच के लिए कल टीम भेजी जाएगी। वैसे सड़क भी गारंटी पीरियड में है। जांच में जो भी कमियां मिलेंगी, उसे ठेका कंपनी से पूरा कराएंगे।"
साहब का यह बयान सुनकर ऐसा प्रतीत होता है जैसे वे बिलासपुर में नहीं, बल्कि किसी दूसरे ग्रह पर निवास करते हैं! क्या अधिकारियों का काम सिर्फ वातानुकूलित कमरों में बैठकर 'शिकायत मिलने' का इंतजार करना है? शहर के बीचों-बीच इतना बड़ा प्रोजेक्ट बन गया और सड़क उखड़ने लगी, लेकिन साहब को खुद भनक तक नहीं लगी। क्या फील्ड पर उतरकर अपने ही शहर के प्रोजेक्ट का निरीक्षण करना इनकी जिम्मेदारी में शामिल नहीं है?
या फिर हर बार की तरह 'शिकायत मिली है, टीम भेजेंगे' वाला रटा-रटाया 'कॉपी-पेस्ट' जवाब देकर पल्ला झाड़ लेना ही इनकी कार्यप्रणाली का मुख्य हिस्सा बन गया है? 'गारंटी पीरियड' का झुनझुना थमाकर ठेकेदार की खराब नीयत और घटिया काम पर पर्दा डालने की यह कवायद अपने आप में विभाग की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवालिया निशान लगाती है। जनता के टैक्स का पैसा पानी में बह रहा है और जिम्मेदार अफसर बस दफ्तरों में कागजी रस्में निभाने में व्यस्त हैं।